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सुखद स्वास्थ्य हेतु प्रकति के पंचतत्वों को समय से सम्भालें- प्रो.आर एन. त्रिपाठी, बीएचयू

सुखद स्वास्थ्य हेतु प्रकति के पंचतत्वों को समय से सम्भालें- प्रो.आर एन. त्रिपाठी, बीएचयू

पायनियर संवाददाता। जौनपुर

आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब इसी पंचतत्व की तरफ जा रहा है जहां हमारा आध्यात्म और आयुर्वेद बहुत पहले से ही था। आज पूरी दुनिया में हो रहे शोध स्पष्ट तौर पर यह कह रहे हैं कि अगर आपके जीवन की जैविक घड़ी में कोई रिदम अर्थात समयबद्धता नहीं है यानी आपको पर्याप्त भूख और नींद नहीं लगती है तो समझिए कि आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हैं। हमारे जीवन की आधी से ज्यादा क्रियाएं प्रकृति की प्राकृतिक लय से चलती हैं। आजल देर रात तक जो जागते हैं, काम करते हैं, मोबाइल स्क्रीन पर लगातार लगे हुए हैं उनमें मोटापा, तनाव और डायबिटीज बहुत ही तेजी के साथ बढ़ रहा है। यही कारण है कि दवाओं का बाजार बढ़ रहा है लेकिन हम स्वस्थ रहने के लिए ना तो उचित जीवन शैली अपना रहे हैं और न व्यायाम, प्राणायाम आदि कर रहे हैं।श्रीमद्भागवतगीता में भगवान कृष्ण ने आज से पांच हजार साल पहले कहा है-
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ ६.१७॥

अर्थात ना तो समुचित आहार है और न मन की शांति के लिए बिहार की व्यवस्था परिणाम यह हो रहा है कि हमारे शरीर के मूल-जनित बात, कफ और पित्त का संतुलन बिगड़ता चला जा रहा है।यही बात रामचरितमानस में तुलसीदास ने कहा है की “प्रीत करें जो तीनों भाई। उपजहिं सन्यपात अधिकाई।। अर्थात बात कफ और पित्त में यदि उचित संतुलन नहीं रहा तो विभिन्न प्रकार की बीमारियां (सन्निपात अर्थात बुखार दर्द) हो जाती है। हमारे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन्हीं तत्वों से हमारा बात, पित्त, कफ निर्धारित होता है। बात प्रकृति से मुख्य रूप से वायु यानी आकाश तत्व मानी जाती है जो गति संचार और तंत्रिका गतिविधि से जुड़ी होती है, पित्त में अग्नि और जल तत्व प्रमुख रूप से पाए जाते हैं जो पाचन और ऊर्जा उत्पादन से जुड़े हैं। हमारे शरीर का पानी इसी से जुड़ा है कफ में पृथ्वी और जल तत्व की अधिकता मानी जाती हैं जो शरीर को स्थिरता और पोषण प्रदान करता हैं।

प्रकाश, हवा, पानी भोजन, विचार, विश्राम आपकी दिनचर्या, आपकी सोच का सीधा असर आपके शरीर पर पड़ता है। आज बड़े-बड़े शहरों में ‘पंचकर्म’ करके लाखों रुपए एक व्यक्ति से लिए जा रहे हैं सरकार द्वारा पंचकर्म की आयुर्वेद से पूरी मान्यता है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ आयुर्वेद के अध्ययन में पंचकर्म और विरेचन थेरेपी को स्वस्थ रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। सरकार भी इस दिशा में काफी कार्य कर रही है लेकिन हमारा दायित्व होता है कि हम इस पर किस प्रकार से अमल करें? हमारे पेट की एक निश्चित दिनचर्या अर्थात टाइमटेबल होता है हम उसको भूल जाते हैं तो हमारे पाचनतंत्र गड़बड़ हो जाते हैं। हमारे तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क के विश्राम करने का एक समय होता है हम रात को अधिक देर तक जग जाते हैं तो ये स्नायुतंत्र काफी गड़बड़ हो जाते हैं।

हमारी आंतों का भोजन पचाने का एक तंत्र होता है हम काफी, ड्रिंक, एसिडिटी, मिठास, तीखे पदार्थ ले लेते हैं यहां तक कि आजकल अल्ट्राप्रोसैस्ड चीजों को जो पैकेट में मिलती हैं उन्हीं के खाने का और उन्हीं को उपयोग करने का फैशन सा है तो इससे हमारी आंतें और खराब हो जाती हैं।प्राकृतिक तौर पर मिट्टी और आकाश से अर्थात सूर्य से फाइबर जो हमें सब्जी, सलाद के रूप में उपलब्ध है हम उनका उपयोग नहीं करते। यही सब हमारी शारीरिक कार्यप्रणाली को बार-बार खराब करते हैं,इनसे बचने के लिए हम एंटीबायोटिक,परगेटिव दवाओं के माध्यम से अपने को ठीक करते रहते हैं लेकिन सत्य यह है कि हमारे ये तंत्र बिगड़ते ही चले जाते हैं। छिति, पृथ्वी अर्थात मिट्टी प्राकृतिक चिकित्सा में आजकल मिट्टी का लेप किया जाता है जिससे मड-थेरेपी कहते हैं, त्वचा के विकारों में आजकल इसका सर्वाधिक उपयोग हो रहा है क्योंकि मूल तत्व के रूप में हमारा शरीर भी इसी से बना हुआ होता है।

आकाश तत्व खालीपन का प्रतीक होता है यह हमारे मन के विशेषकर पाचनतंत्र तंत्रिकातंत्र पर बहुत प्रभाव डालता है।यदि हम खुले आकाश अर्थात कुछ देर धूप में रहे तो इस पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।अग्नि के बारे में तो कहा गया है कि जठराग्नि सात प्रकार की होती है यह भोजन को ऊर्जा में जिसे हम एटीपी एडिनोसिन ट्राई फास्फेट कहते हैं बदलती है,इसीलिए धूप का स्नान करना,भाप का स्नान करना और हमारे ऋषिजन तो पंचाग्नि तापते थे। ठीक इसी प्रकार जल जो हमारे शरीर का 70% है यह हमारे तंत्रिकातंत्र को ठीक रखता है आजकल पंचकर्म में शीटजबाथ, और कंट्रास्टवाथ, जैसे नए तरीके आए हैं ठंडा पानी और गर्म पानी के स्नान इत्यादि की भी प्राकृतिक चिकित्सा चल रही है। वायु हम जानते हैं ऑक्सीजन का प्रवाह तांत्रिक और हृदय को स्वस्थ रखता है,गहरी सांस लेना और खुली हवा में रहना हमारे जो तनाव वाले हार्मोन कोर्टिसोल इत्यादि हैं उनका स्तर घटाता है और हमारे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।

इस प्रकार यह पांच तत्व जिससे हमारा शरीर निर्मित हुआ है वास्तव में ये मूल तत्व, प्रकृति में उपलब्ध इन्हीं तत्व से ही मिलना चाहते हैं अर्थात इस प्रकार की क्रियायों से यह अपने को पुष्ट रखते हैं इसलिए हमको चाहिए हम अपने आयुर्वेद और प्राकृतिक तत्वों पर ध्यान दें। हम अगर सूर्य की पहली किरण के साथ जागते हैं, समय पर भोजन करते हैं रात को शांत नींद से सोते हैं, खुली हवा का उपयोग करते हैं,समय मिलने पर हरियालीयुक्त दृश्यों को प्रशन्न भाव से देखते हैं तो स्वभाविक रूप से तनाव कम हो जाते हैं।अपने भोजन में प्रकृतिजनित सलाद, सब्जी, फल का उपयोग करते हैं तो निश्चित रूप से हमारा जीवन ज्यादा स्वस्थ रह सकता है। इसलिए हमारे यहां कहा गया है कि इन्हीं पांच तत्वों से यह मानव का अधम शरीर बना है जिसे बहुत ही कम समय का माना जाता है और जिसे सही ढंग से नहीं संभाला गया तो उसका समय और कम हो जाता है।

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