उतरेथू के ऐतिहासिक टीले का रहस्य 25 साल बाद भी बरकरार, उत्खनन की मांग तेज
2001 से प्रशासनिक पत्राचार के बावजूद नहीं शुरू हुई पुरातात्विक जांच, स्वामी ओमप्रकाश ने एएसआई से वैज्ञानिक उत्खनन कराने की उठाई मांग

हजपुरा, अम्बेडकरनगर। टांडा तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत उतरेथू में स्थित प्राचीन ऐतिहासिक टीले का रहस्य करीब 25 साल बाद भी अनसुलझा है। स्थानीय स्तर पर इसे राजभर वंश के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल बताया जाता है। दावा है कि टीले के समीप करीब 15 फीट की खुदाई में किले की विशाल दीवार के अवशेष मिले थे। इसके बावजूद अब तक यहां व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक उत्खनन नहीं हो सका है। इस मामले को लेकर मिशन योगी सीएम अगेन के प्रदेश संयोजक एवं पूर्व वायुसेना अधिकारी स्वामी ओमप्रकाश ने संबंधित विभागों से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
2001 के सरकारी पत्र में दर्ज है टीले का उल्लेख
उपलब्ध कराए गए प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, तत्कालीन उपजिलाधिकारी टांडा शिशिर सिंह ने 4 जून 2001 को जारी पत्र में उतरेथू गांव के दक्षिण-पश्चिम स्थित टीले के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख किया था। पत्र में जन कल्याण समिति की ओर से उठाए गए मुद्दे और टीले के समीप लगभग 15 फीट खुदाई में किले की मोटी दीवार के अवशेष मिलने की बात दर्ज होने का दावा किया गया है।
इसके बाद 22 जनवरी 2003 को तत्कालीन उपजिलाधिकारी चंद्रशेखर और 29 मई 2003 को तत्कालीन उपजिलाधिकारी बसंता की ओर से भी जिलाधिकारी को पत्र लिखे जाने की जानकारी दी गई है। इन पत्रों के माध्यम से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से आवश्यक पत्राचार करने का अनुरोध किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि इसके बाद संबंधित विभागों ने स्थल का कोई औपचारिक सर्वेक्षण कराया या नहीं।
राजा उत्तम चंद के शासन से जोड़ा जाता है इतिहास
स्थानीय स्तर पर इस टीले को राजभर वंश के राजा उत्तम चंद और उनके शासनकाल से जोड़कर देखा जाता है। दावा किया जाता है कि वर्ष 1447 ईस्वी में उतरेथू इस क्षेत्र में राजभर सत्ता का प्रमुख केंद्र था। हालांकि, इन ऐतिहासिक दावों की प्रामाणिकता, किले के अवशेषों की वास्तविक प्रकृति और स्थल की प्राचीनता का निर्धारण पुरातात्विक सर्वेक्षण तथा प्रमाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है।
स्वामी ओमप्रकाश बोले, ऐतिहासिक धरोहर की उपेक्षा उचित नहीं:मिशन योगी सीएम अगेन के प्रदेश संयोजक एवं पूर्व वायुसेना अधिकारी स्वामी ओमप्रकाश ने कहा कि उतरेथू का ऐतिहासिक टीला केवल स्थानीय लोगों की जिज्ञासा का विषय नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल हो सकता है। यदि यहां प्राचीन किले और राजभर वंश से संबंधित अवशेष मौजूद हैं, तो उनकी वैज्ञानिक जांच कराकर वास्तविक इतिहास सामने लाना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि प्रदेश सरकार संबंधित विभागों के माध्यम से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से संपर्क करे और स्थल का विशेषज्ञों की टीम से सर्वेक्षण कराए। इसके साथ ही, वर्ष 2001 और 2003 में हुए प्रशासनिक पत्राचार की स्थिति स्पष्ट करते हुए यह भी बताया जाए कि प्रस्ताव पर आगे क्या कार्रवाई हुई।
स्वामी ओमप्रकाश ने कहा कि यदि पुरातात्विक जांच में ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि होती है, तो अवशेषों के संरक्षण और स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाए जाने चाहिए। इससे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय लोगों को भी लाभ मिल सकता है।
अब वैज्ञानिक जांच से खुलेगा इतिहास का राज
उतरेथू के टीले को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान दावों और चर्चाओं से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जांच और प्रमाणिक दस्तावेजों से ही संभव है। प्रशासनिक पत्राचार की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने, स्थल का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने और आवश्यकतानुसार उत्खनन शुरू करने की मांग बेतिया मंदिर श्री अयोध्या धाम के महंत पूज्य अवधेश जी महाराज वशिष्ठ पीठाधीश्वर हिंदू धाम अयोध्या पूज्य राघवेश दास वेदांती जी महाराज, सद्गुरू सदन श्री राम जानकी मंदिर गोलाघाट अयोध्या के महंत पूज्य सियाकिशोरीशरण जी महाराज,राधा कृष्ण मंदिर वृंदावन के मंहत सुभाषानंद जी महाराज, श्री राष्ट्रीय संत सुरक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय प्रकाश भारती जी महाराज,भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर नगर के जिला उपाध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र, पूर्व विधायक जयराम विमल, तत्कालीन समिति से जुड़े शिक्षक सुजीत कुमार त्रिपाठी, पूर्व प्रधान महेंद्र सिंह, पूर्व प्रधान राजेश्वरी तिवारी,बाबा वीरेंद्र दास त्यागी, बाबा फरसाधारी सहित जिले के संतों और बुद्धिजीवियों ने संबंधित विषय पर उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित करने का निवेदन किया है। संबंधित विभाग इस दिशा में पहल करते हैं तो टीले की वास्तविक ऐतिहासिक पहचान सामने आ सकती है और क्षेत्र की विरासत के संरक्षण का रास्ता भी खुल सकता है।


