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भारत विविधताओं का देश, प्रत्येक प्रदेश की क्षेत्र की अपनी भाषा और संस्कृति : पदम श्री सैयद

भारत विविधताओं का देश, प्रत्येक प्रदेश की क्षेत्र की अपनी भाषा और संस्कृति : पदम श्री सैयद

पायनियर। वाराणसी

सोमवार को मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्वावधान में तुलनात्मक साहित्यिक विषय पर द्विसाप्ताहिक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. आनंदवर्धन शर्मा, निदेशक, मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने की, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सैयद एनुल हसन, कुलपति, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय ऊर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. श्रद्धा सिंह, विभागाध्यक्षा, हिंदी विभाग, का.हि.वि.वि. रहे। इस 12 दिवसीय पाठ्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों से पधारे 41 प्राध्यापक भाग ले रहे हैं।
कार्यक्रम के आरंभ में विशिष्ट अतिथि प्रो. श्रद्धा सिंह ने बताया कि अंग्रजी के कवि मैथ्यू आर्नल्ड ने सन 1848 में अपने एक पत्र में सबसे पहले कम्पैरेटिव लिटरेजर पद का प्रयोग किया था तथा भारत में सन 1907 में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने विश्व साहित्य का उल्लेख करते हुए साहित्य के अध्ययन में तुलनात्मक दृष्टि की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. सैयद एनुल हसन ने कहा कि भारत विविधताओं का देश है। प्रत्येक प्रदेश की क्षेत्र की अपनी भाषा और संस्कृति है। हम भारत की तुलना किसी अन्य देश से कर ही नहीं सकते। हमारी पहचान के अनेक स्तर हैं। भारतीय भाषाओं में भी अंतरसंबद्धता ही उसका सौंदर्य है। हम जब लोकतंत्र की बात करते हैं तो इसका सीधा संबंध सामाजिक न्याय से है। बनारस की बात करें तो यहाँ वैविध्य भी है और साम्य भी है। यहाँ बिस्मिल्ला खाँ भी हैं, रविशंकर भी, बिरजू महाराज भी हैं और संगीत के अनेक अन्य घराने भी। आज भारतीय ज्ञान परंपरा को और आगे जानने की जरूरत है। रचनाओं के संदर्भ में प्रो. हसन ने प्रसाद और दुष्यंत कुमार के उदाहरण भी दिए और कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम ज्ञान का विस्तार करने के लिए आवश्यक हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. आनंदवर्धन शर्मा ने तुलनात्मक साहित्य के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा करते हुए साहित्यिक परम्पराओं, साहित्यिक आलोचना तथा साहित्यिक ग्रंथों का उल्लेख किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ महामना मालवीय जी की मूर्ति पर माल्यार्पण और कुलगीत गायन से हुआ। कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन पाठ्यक्रम समंवयक प्रो. उर्वशी गहलौत ने किया।

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