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आरक्षण था, है और रहेगा—मगर अंतिम आदमी तक कब पहुँचेगा? न्यायप्रिय समीक्षा का समय आ गया है

आरक्षण भारत के सामाजिक न्याय की यात्रा का महज एक संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि सदियों की सामाजिक विषमता से उपजी आवश्यकता है। जिन समुदायों को लंबे समय तक शिक्षा, सम्मान, अवसर और सत्ता-संरचनाओं से दूर रखा गया, उनके लिए आरक्षण बराबरी की…

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आरक्षण था, है और रहेगा—मगर अंतिम आदमी तक कब पहुँचेगा? न्यायप्रिय समीक्षा का समय आ गया है

आरक्षण भारत के सामाजिक न्याय की यात्रा का महज एक संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि सदियों की सामाजिक विषमता से उपजी आवश्यकता है। जिन समुदायों को लंबे समय तक शिक्षा, सम्मान, अवसर और सत्ता-संरचनाओं से दूर रखा गया, उनके लिए आरक्षण बराबरी की दौड़ में प्रवेश का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना। इसलिए आरक्षण की मूल भावना पर प्रश्न उठाना सामाजिक न्याय की आवश्यकता पर प्रश्न उठाने जैसा होगा।

लेकिन एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में उस अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है, जिसके लिए इसकी व्यवस्था की गई थी?यहीं से बहस आरक्षण के पक्ष और विपक्ष से आगे बढ़कर आरक्षण के भीतर न्याय की होनी चाहिए।आरक्षण था, है और रहेगा—लेकिन क्या इसका लाभ एक ही परिवार, एक ही सामाजिक समूह या लगातार उन्हीं सक्षम लोगों तक बार-बार पहुँचता रहे और उसी श्रेणी के अत्यंत वंचित व्यक्ति अवसर की प्रतीक्षा करते रहें? यदि ऐसा हो रहा है तो फिर हमें व्यवस्था के उद्देश्य और उसके परिणाम के बीच की दूरी को स्वीकार करना होगा।कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, लेकिन अगर नल की धार एक ही जगह गिरती रहे तो बाकी घड़ा खाली ही रहेगा।” सामाजिक न्याय की व्यवस्था में भी यही प्रश्न उठता है।

आरक्षण का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व और अवसर की समानता सुनिश्चित करना था, न कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक सीमित वर्ग के लिए अवसरों का स्थायी हस्तांतरण। संविधान निर्माताओं की दृष्टि में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना एक परिवर्तनकारी परियोजना थी। इसलिए समय के साथ यह देखना भी आवश्यक है कि व्यवस्था ने किन लोगों को ऊपर उठाया और कौन अब भी पीछे छूट गया।यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—आरक्षण समाप्त करने की मांग और आरक्षण की समीक्षा की मांग एक बात नहीं है।

आरक्षण खत्म करना सामाजिक न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है, लेकिन आरक्षण की व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और लक्ष्यपरक बनाने के लिए समीक्षा करना उसी सामाजिक न्याय को मजबूत कर सकता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि बहस भावनाओं के शोर में नहीं, आंकड़ों की रोशनी में हो।

किस वर्ग को आरक्षण का लाभ कितनी बार मिला? किन परिवारों की कई पीढ़ियाँ सरकारी सेवाओं, उच्च शिक्षा और राजनीतिक-सामाजिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व हासिल कर चुकी हैं? उसी श्रेणी के कितने परिवार आज भी प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों से दूर हैं? किन क्षेत्रों में आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत अधिक पहुँचा और किन इलाकों में उसकी पहुँच कमजोर रही?इन सवालों के उत्तर किसी पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक आंकड़ों से मिलने चाहिए।यही वह बिंदु है जहाँ “अंतिम आदमी” की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।

महात्मा गांधी का ‘अंत्योदय’ और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘अंतिम व्यक्ति’—दोनों भारतीय सार्वजनिक जीवन में इस विचार की याद दिलाते हैं कि विकास और न्याय की कसौटी यह नहीं कि ऊपर बैठे कितने लोग आगे बढ़े, बल्कि यह है कि सबसे पीछे खड़ा व्यक्ति कितना आगे आया।

यदि आरक्षण की सीढ़ी पर चढ़कर एक परिवार की कई पीढ़ियाँ सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त हो चुकी हैं, जबकि उसी व्यापक श्रेणी का दूसरा परिवार अभी भी अवसर की पहली सीढ़ी तक नहीं पहुँच पाया है, तो नीति-निर्माताओं को इस असमानता का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति को उसकी उपलब्धि के लिए दंडित किया जाए। मेहनत से मिली सफलता अपराध नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि सार्वजनिक नीति का लाभ उन लोगों तक भी कैसे पहुँचे जो अभी तक उससे वंचित हैं।यहीं पर समीक्षा, पुनर्संतुलन और बेहतर लक्ष्यीकरण की आवश्यकता सामने आती है।

हाल के वर्षों में स्वयं न्यायपालिका के स्तर पर भी अनुसूचित जातियों के भीतर अपेक्षाकृत अधिक वंचित समूहों तक लाभ पहुँचाने के लिए उप-वर्गीकरण की बहस को संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। यह संकेत है कि सामाजिक न्याय की नीतियों के भीतर भी यह देखना आवश्यक है कि लाभ वास्तव में किस हिस्से तक पहुँच रहा है।

लेकिन समीक्षा का रास्ता बेहद सावधानी से तय होना चाहिए। जातिगत असमानता को केवल आर्थिक गरीबी के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। सामाजिक भेदभाव, ऐतिहासिक वंचना, शैक्षणिक पिछड़ापन, भौगोलिक स्थिति और संस्थागत प्रतिनिधित्व—इन सभी को साथ लेकर चलना होगा।इसलिए किसी भी समीक्षा का उद्देश्य आरक्षण को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके भीतर न्याय को मजबूत करना होना चाहिए।

एक संभावित रास्ता यह हो सकता है कि आरक्षण के लाभार्थियों का व्यापक और नियमित सामाजिक-आर्थिक अध्ययन हो। लाभ के वितरण का वर्गवार और क्षेत्रवार विश्लेषण किया जाए। जिन समुदायों या समूहों का प्रतिनिधित्व लगातार बहुत कम है, उनके लिए लक्षित नीतियों पर विचार हो। उच्च शिक्षा में प्रवेश से पहले ही कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा, छात्रवृत्ति, कोचिंग, डिजिटल संसाधन और आवासीय सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँ।

क्योंकि केवल सीट आरक्षित कर देने से सामाजिक न्याय पूरा नहीं होता।जिस बच्चे को अच्छी शिक्षा ही नहीं मिली, उसके लिए विश्वविद्यालय की आरक्षित सीट भी दूर का सपना है।

यही कारण है कि आरक्षण के साथ-साथ सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा की पहुँच, कौशल विकास, छात्रवृत्ति और रोजगार के अवसरों को मजबूत करना होगा। आरक्षण अंतिम उपचार नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक न्याय नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

साथ ही, समीक्षा की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी भी समुदाय के प्रति भेदभाव या राजनीतिक प्रतिशोध की गुंजाइश न हो। न्याय का तराजू दोनों पलड़ों में बराबर वजन मांगता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बहस को ‘आरक्षण बनाम मेरिट’ की कृत्रिम लड़ाई में नहीं बदला जाना चाहिए। आखिर अवसर की असमान शुरुआत में पैदा हुई प्रतिस्पर्धा को केवल मेरिट कहना भी अधूरा तर्क है। दूसरी ओर, मेरिट और उत्कृष्टता की उपेक्षा करके कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।इसलिए भारत को ऐसी नीति चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता, प्रतिनिधित्व और अवसर, संवैधानिक संरक्षण और वास्तविक सशक्तीकरण—सभी साथ चलें।

आरक्षण की बहस में सबसे बड़ा खतरा यही है कि हम या तो अतीत की पीड़ा में फँस जाएँ या वर्तमान की असमानता को देखकर मूल उद्देश्य ही भूल जाएँ। दोनों रास्ते गलत हैं।सही रास्ता बीच का है—न आरक्षण के मूल उद्देश्य से समझौता, न उसके लाभ के असमान वितरण पर आंखें मूंदना।आखिर सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आरक्षण रहेगा या नहीं। संवैधानिक और सामाजिक न्याय की भारतीय यात्रा में यह बहस कहीं अधिक गंभीर है।सवाल यह होना चाहिए कि आरक्षण का लाभ उस व्यक्ति तक कब पहुँचेगा, जो आज भी सबसे पीछे खड़ा है?यदि एक ही परिवार बार-बार लाभ लेता रहे और उसी व्यवस्था के भीतर कोई दूसरा परिवार पीढ़ियों तक प्रतीक्षा करता रहे, तो हमें ठहरकर सोचना होगा। “घर की मुर्गी दाल बराबर” वाली स्थिति सामाजिक न्याय के साथ नहीं चल सकती।

आरक्षण की समीक्षा किसी के अधिकार छीनने की कवायद नहीं होनी चाहिए; यह यह सुनिश्चित करने की कोशिश होनी चाहिए कि अधिकार का लाभ वास्तव में उस व्यक्ति तक पहुँचे जिसके लिए व्यवस्था बनाई गई थी।समय आ गया है कि आरक्षण पर नारे नहीं, निष्पक्ष आंकड़े बोलें; आरोप नहीं, प्रमाण बोलें; राजनीति नहीं, सामाजिक न्याय की कसौटी बोले।क्योंकि आरक्षण था, है और रहेगा—लेकिन उसकी सबसे बड़ी सफलता तभी होगी, जब उसके लाभ की कतार में खड़ा अंतिम व्यक्ति भी एक दिन आगे आकर कह सके कि अब न्याय मेरे दरवाजे तक भी पहुँचा है।

लेखक: डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह

परिचय: पोस्ट डॉक्टोरल फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली)

लेखक

Rashmi Singh

रश्मि सिंह मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और मीडिया एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ग्राउंड रिपोर्टिंग और कंटेंट लेखन से की तथा समय के साथ देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों और समाचार चैनलों में कार्य किया। राजनीति, समसामयिक घटनाक्रम, उत्तर प्रदेश की खबरों, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन जगत की रिपोर्टिंग एवं विश्लेषण में उन्हें विशेष अनुभव प्राप्त है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने तथ्यपरक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता को अपनी पहचान बनाया है।

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