भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय 7.8 प्रतिशत और 2.6 प्रतिशत की दो अलग-अलग विकास दरों के बीच जश्न और बहस, दोनों कर रही है। एक ओर इस उत्साहजनक आंकड़े की सांख्यिकीय विश्वसनीयता को समझाने के लिए आंकड़ों के विश्लेषण की तकनीकों, पद्धति में बदलाव और 2022-23 को आधार वर्ष मानकर अपनाई गई नई जीडीपी श्रृंखला का उल्लेख किया जा रहा है। दूसरी ओर, वर्ष 2025 के अंत में आईएमएफ ने भारत के व्यापक आर्थिक आंकड़ों की निगरानी और आकलन से जुड़ी प्रणालियों को ‘C’ ग्रेड दिया था, जिसमें आधार वर्ष की गणनाओं में असंगतियों का भी उल्लेख किया गया था। ऐसे में पूरी आर्थिक बहस इस बात तक सिमट जाती है कि एक अस्थायी और अभी अंतिम रूप से निर्धारित न हुआ आंकड़ा सही है या गलत। यह स्थिति अपने आप में विचित्र है। अल्पकालिक रूप से आकर्षक आंकड़े आर्थिक परिवर्तन के स्थायी प्रमाण नहीं हो सकते।
2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की भारत की आकांक्षा के लिए निरंतर उच्च आर्थिक वृद्धि आवश्यक है। लेकिन बेहतर आर्थिक प्रदर्शन का आकलन केवल विकास दर से नहीं किया जा सकता। इसके लिए निवेश, विनिर्माण, रोजगार के अवसर, मुद्रा का मूल्य और अन्य व्यापक आर्थिक संकेतकों को भी साथ देखना होगा। विडंबना यह है कि इनमें से कई संकेतक ऊंची जीडीपी वृद्धि के साथ समान गति से आगे बढ़ते दिखाई नहीं देते।

भारत में निजी और विदेशी निवेश में वृद्धि अभी भी धीमी है। विश्व बैंक के अनुसार, 2012 से 2023 के बीच विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में चीन की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई रही, जबकि ब्राजील को लगभग 10 प्रतिशत और भारत को लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा मिला। वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी भी वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई है। दूसरी ओर, 2025-26 में रुपये में लगभग 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो करीब एक दशक में उसकी सबसे तेज गिरावट रही।
रोजगार की स्थिति को देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। जून 2026 में युवा बेरोजगारी 15 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि शहरी युवाओं में बेरोजगारी दर 18.2 प्रतिशत और युवा महिलाओं में 20 प्रतिशत रही। वर्ष 2025 में केवल 23.6 प्रतिशत कार्यबल नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार में था, जिसकी औसत मासिक आय लगभग 18,000 से 24,000 रुपये के बीच थी। इसके विपरीत, 56.2 प्रतिशत कार्यबल स्वरोजगार में और 20.2 प्रतिशत आकस्मिक श्रम में था। आकस्मिक श्रमिकों की दैनिक आय महिला श्रमिकों के लिए लगभग 315 रुपये और पुरुष श्रमिकों के लिए लगभग 455 रुपये थी।
भारत में बड़ी संख्या में छोटी इकाइयां आज भी आकस्मिक श्रम, कम मजदूरी और असंगठित रोजगार संरचना के सहारे चल रही हैं। रोजगार की मजबूत संरचना तभी बन सकती है जब श्रमिक कम उत्पादकता वाली कृषि और घरेलू उद्यमों से निकलकर उद्योगों और बड़े बाजारों से जुड़ें। यदि भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभ को वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदलना है, तो ऐसे निवेश की आवश्यकता होगी जो रोजगार पैदा करे और उत्पादकता बढ़ाए। जीडीपी कई माध्यमों से बढ़ सकती है, लेकिन सतत विकास के लिए निवेश, रोजगार और आय के बीच एक मजबूत चक्र आवश्यक है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जीडीपी में वृद्धि आखिर कितनी प्रभावी ढंग से लोगों के जीवन में सुधार में परिवर्तित हो रही है। कोई देश प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकता है, लेकिन उसके नागरिक फिर भी अभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ सकते हैं। इसलिए भारत को केवल आर्थिक आंकड़ों से आगे बढ़कर यह देखना होगा कि विकास वास्तव में नागरिकों तक क्या पहुंचा रहा है।
बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक संकेतकों के संदर्भ में भारत अभी भी वैश्विक मानकों से पीछे है। शिक्षा, स्वास्थ्य, असमानता और गरीबी जैसी चुनौतियां आर्थिक विकास की गुणवत्ता को निर्धारित करती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और नीति आयोग के नवीनतम आकलन में भी शिक्षा एवं स्वास्थ्य, रोजगार एवं कौशल विकास, ग्रामीण विकास तथा निवेश एवं बुनियादी ढांचे को भारत के आर्थिक परिवर्तन के केंद्रीय घटकों के रूप में रेखांकित किया गया है।
:max_bytes(150000):strip_icc()/GettyImages-636251500-53ea44b08ca04fb7bc4f0c633cd3ea5d.jpg)
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट में भारत 193 देशों में 130वें स्थान पर है। आज भी देश की केवल 63 प्रतिशत आबादी को सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता सेवाओं की सुविधा उपलब्ध है। शहरीकरण भी एक नई चुनौती लेकर आया है। शहर आर्थिक गतिविधियों के इंजन बन रहे हैं, लेकिन यातायात का दबाव, कचरा, प्रदूषण और अपर्याप्त सार्वजनिक बुनियादी ढांचा उस उत्पादकता को कमजोर कर सकते हैं, जिसकी उम्मीद शहरीकरण से की जाती है। भौतिक बुनियादी ढांचे के निर्माण में निवेश की कमी नहीं है, लेकिन उसके रखरखाव की अक्सर अनदेखी होती है, क्योंकि रखरखाव राजनीतिक रूप से उतना दिखाई नहीं देता जितना नई परियोजनाओं का निर्माण।
भारत की विकास चुनौती को इसलिए केवल जीडीपी के आकार और उसकी वृद्धि दर से नहीं समझा जा सकता। वास्तविक आर्थिक परिवर्तन का अर्थ है—अधिक उत्पादक रोजगार, बेहतर आय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य, बेहतर शहरी जीवन, स्वच्छता, कम असमानता और टिकाऊ बुनियादी ढांचा। विकास की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई, इसके साथ-साथ यह भी कि नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ।
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए केवल बड़े आंकड़ों की अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि बेहतर जीवन की अर्थव्यवस्था बनानी होगी। जीडीपी विकास का एक महत्वपूर्ण पैमाना है, लेकिन विकास का अंतिम लक्ष्य जीडीपी नहीं, बल्कि नागरिकों का कल्याण है।

कजलीन कौर
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज ऑफ कॉमर्स में सहायक प्रोफेसर हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)