वर्ष 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ था, तब देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी। आज भारत की आबादी लगभग 150 करोड़ के निकट पहुँच चुकी है। इनमें लगभग 35 से 40 करोड़ नागरिक युवा पीढ़ी, अर्थात जनरेशन-ज़ेड (Gen-Z) से संबंधित हैं। यह वर्ग भारत की सबसे बड़ी शक्ति है और आने वाले दशकों में देश की दिशा एवं दशा निर्धारित करने की क्षमता रखता है।
भारत के महानगरों में प्रत्येक सुबह हजारों युवा अपने कंधों पर बैग लटकाए मोटरसाइकिल, स्कूटर, साइकिल अथवा सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से अपने कार्यस्थलों और शिक्षण संस्थानों की ओर तेजी से बढ़ते दिखाई देते हैं। सड़कों पर सीमित स्थान के लिए उनकी प्रतिस्पर्धा केवल शहरी जीवन की चुनौतियों को नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बेहतर बनाने के उनके संकल्प को भी दर्शाती है। यह पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का महत्व भली-भांति समझती है। लाखों छात्र डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य पेशेवर बनने का सपना देखते हैं। यही दृश्य ग्रामीण भारत में भी दिखाई देता है, जहाँ युवा किसान कठिन मौसम के बावजूद खेतों में परिश्रम करते हैं और श्रमिक वर्ग भी भीषण गर्मी तथा कड़ाके की सर्दी में निरंतर कार्य करता रहता है। ऐसे अनेक प्रेरक उदाहरण भी हैं जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों ने स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई कर उच्च प्रशासनिक पदों और प्रतिष्ठित व्यवसायों में सफलता प्राप्त की। ये कहानियाँ भारत के युवाओं के संघर्ष, आत्मविश्वास और आकांक्षाओं का प्रतीक हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएँ भारत में कोई नई बात नहीं हैं। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) वर्ष 2013 में भारत सरकार द्वारा मेडिकल, डेंटल तथा अन्य संबद्ध स्वास्थ्य विज्ञान पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एक समान परीक्षा के रूप में प्रारंभ की गई थी। इसके आरंभ से ही समय-समय पर प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आते रहे हैं। इसी प्रकार केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आयोजित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के संबंध में भी ऐसे आरोप समय-समय पर लगाए जाते रहे हैं। किंतु सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ये घटनाएँ प्रायः स्थानीय स्तर तक सीमित रहीं और कभी भी राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकीं।
स्थिति वर्ष 2026 में नाटकीय रूप से बदल गई। नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों ने देशभर के विद्यार्थियों और अभिभावकों में व्यापक चिंता उत्पन्न कर दी। विभिन्न समाचारों के अनुसार, परीक्षा रद्द होने, अनिश्चितता तथा मानसिक तनाव के कारण देशभर में लगभग बीस विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने के आरोप सामने आए। परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने के उद्देश्य से सरकार ने 21 जून 2026 को देशव्यापी पुनः परीक्षा आयोजित की, जिसमें लगभग 17 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया तथा 9 लाख से अधिक अभ्यर्थी सफल घोषित हुए।
इसी दौरान विदेश में रह रहे एक व्यक्ति द्वारा “कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)” नामक एक संगठन की स्थापना की घोषणा की गई। अत्यंत कम समय में इस संगठन ने व्यापक जनचर्चा प्राप्त कर ली। बताया गया कि लाखों लोगों ने इसके सोशल मीडिया मंचों का अनुसरण किया तथा इसकी सदस्यता ग्रहण की। इस प्रकार नीट विवाद से उत्पन्न घटनाक्रमों में सीजेपी का उदय सबसे अधिक चर्चित विषयों में शामिल हो गया।
सीजेपी की तीव्र लोकप्रियता ने अनेक पर्यवेक्षकों को आश्चर्यचकित किया। इसके संस्थापक अभिजीत दिपके ने संगठन के लिए प्रवक्ताओं एवं अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति की। समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा संगठन के वित्तीय स्रोतों को लेकर प्रश्न उठाए गए। कुछ लोगों का मानना है कि संगठन को भारत-विरोधी समूहों अथवा भारत की राजनीति को प्रभावित करने में रुचि रखने वाले अन्य हित समूहों का समर्थन प्राप्त हो सकता है। यद्यपि ये सभी विषय अभी सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि संगठन अपने वित्तीय स्रोतों और कार्यप्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता बनाए रखेगा।
अपने समर्थकों की अपेक्षाओं को देखते हुए सीजेपी ने शांतिपूर्ण एवं अहिंसक प्रदर्शन की घोषणा की। संगठन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार तथा विवाद के दौरान कथित रूप से आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की मांग की। सामाजिक कार्यकर्ता एवं नवप्रवर्तक सोनम वांगचुक, जो अपने अनेक पेटेंट और शैक्षिक पहलों के लिए जाने जाते हैं, ने भी इन मांगों का समर्थन किया।
कई पर्यवेक्षकों का मानना था कि भारत सरकार ने प्रारंभिक चरण में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई और प्रदर्शनकारियों से प्रभावी संवाद स्थापित करने में विलंब किया। जैसे-जैसे मीडिया कवरेज बढ़ा, आंदोलन देश के विभिन्न भागों में फैलता गया। भारत सदैव अहिंसा की अपनी परंपरा पर गर्व करता रहा है और आंदोलन की घोषणा भी शांतिपूर्ण विरोध के रूप में की गई थी। हालांकि, यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ असामाजिक तत्व आंदोलन में घुस आए और उन्होंने इसकी शांतिपूर्ण प्रकृति को बाधित करने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं।जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को हटाए जाने की घटना को कई लोगों ने आंदोलन का निर्णायक मोड़ माना। इसके बाद हजारों अतिरिक्त प्रदर्शनकारी वहाँ पहुँच गए। बढ़ते जनदबाव और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच अंततः सरकार ने सीजेपी द्वारा उठाई गई अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया।
नीट विवाद और सीजेपी के अभूतपूर्व विस्तार ने निस्संदेह भारत की राजनीतिक चर्चा को नया आयाम दिया है। भारत में लगभग 35 करोड़ जनरेशन-ज़ेड के युवा हैं, जो नए विचारों और वैकल्पिक मंचों के प्रति अधिक ग्रहणशील माने जाते हैं। सीजेपी ने भविष्य में अनेक अन्य सार्वजनिक मुद्दों को भी उठाने की घोषणा की है। यद्यपि संगठन ने अभी तक किसी प्रमुख राजनीतिक दल के साथ औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है, फिर भी इसके कुछ पदाधिकारियों के कथित रूप से आम आदमी पार्टी से जुड़े होने की चर्चाएँ सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई हैं।
भारतीय लोकतंत्र के विकास में प्रत्येक पीढ़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। PUCL बनाम भारत संघ (2003) 4 SCC 399 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि संविधान में निहित मौलिक अधिकार स्थिर नहीं हैं। न्यायालय ने उल्लेख किया कि समय के साथ उसने “इस ढाँचे में आत्मा और रक्त का संचार किया है तथा इसे जीवंत बनाया है।” न्यायालय ने यह भी कहा कि “अधिकांश मौलिक अधिकार ऐसे रिक्त पात्र हैं, जिनमें प्रत्येक पीढ़ी अपने अनुभवों के आधार पर नया अर्थ और नई सामग्री भरती है।”
भारतीय संविधान का भाग-III नागरिकों को समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार, संगठन या संघ बनाने का अधिकार तथा जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का अभिन्न अंग माना गया है। अनुच्छेद 13 यह सुनिश्चित करता है कि संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो इन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे।अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण एवं निःशस्त्र सभा करने तथा संगठन या संघ बनाने का अधिकार प्रदान करता है। आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसा के गंभीर आरोप भी सामने आए। इस पृष्ठभूमि में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने संतुलित अंतरिम निर्देश जारी करते हुए उन 18 वर्ष से कम आयु के छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। न्यायालय ने प्रदर्शन से संबंधित सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग तथा पीसीआर लॉग सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया। साथ ही, जिन छात्र प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए जाँच जारी रखने की अनुमति दी। इन निर्देशों का व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में कुछ ही ऐसे जन आंदोलन हुए हैं जिन्होंने देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। जयप्रकाश नारायण आंदोलन के परिणामस्वरूप जनता पार्टी का गठन हुआ, जबकि अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आगे चलकर आम आदमी पार्टी के उदय का आधार बना। इन दोनों आंदोलनों ने अंततः देश की राजनीतिक दिशा बदलने और सरकारों के गठन पर प्रभाव डाला।
नीट 2026 आंदोलन का अंतिम प्रभाव क्या होगा, इसका उत्तर भविष्य ही देगा। सीजेपी ने अभी तक न तो चुनावी राजनीति में प्रवेश की औपचारिक घोषणा की है और न ही ऐसी संभावना से स्पष्ट रूप से इनकार किया है। किंतु यदि यह संगठन अपने जनाधार का विस्तार करने, सार्वजनिक समर्थन बनाए रखने और भविष्य में राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने में सफल होता है, तो यह उन स्थापित राजनीतिक दलों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है जिन्होंने अतीत में देश पर शासन किया है अथवा वर्तमान में सत्ता में हैं।
अरुण भारद्वाज
लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।










