आर्थिक तंगी बनी थी रिहाई में बाधा, फोरम ने जमा कराया 23 हजार का अर्थदंड

नदवा के छात्रों ने भी अभियान में किया सहयोग, मुझे निबंध पांच बंधिया को कराया गया रिहा
पायनियर समाचार सेवा
लखनऊ। आर्थिक तंगी के चलते सजा पूरी होने के बाद भी जेल में रहने को मजबूर पांच बंदियों के लिए ऑल इंडिया पयामे इंसानियत फोरम की लखनऊ यूनिट मददगार बनी। फोरम ने जिला कारागार लखनऊ में निरुद्ध पांच सिद्धदोष बंदियों का कुल 23 हजार रुपए अर्थदंड जमा कराकर उनकी रिहाई का रास्ता साफ कराया। फोरम की ओर से इस तरह जरूरतमंद बंदियों की सहायता किए जाने का यह प्रयास सामाजिक सरोकार से जुड़ी पहल के रूप में सामने आया है। बताया गया कि पांचों बंदी अपनी न्यायिक सजा पूरी कर चुके थे, लेकिन अदालत द्वारा लगाया गया जुर्माना अदा करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे।
अर्थदंड जमा न होने के कारण उनकी रिहाई नहीं हो पा रही थी। इसकी जानकारी मिलने पर फोरम ने कारागार प्रशासन से संपर्क कर नियमानुसार अर्थदंड की धनराशि जमा कराई।अभियान का नेतृत्व फोरम के वरिष्ठ पदाधिकारी शफीक चौधरी और इंजीनियर मुहम्मद साकिब ने किया। इस कार्य में दारुल उलूम नदवतुल उलमा के छात्रों ने भी सक्रिय सहयोग किया। फोरम के प्रतिनिधियों ने कारागार प्रशासन के समक्ष आवश्यक प्रक्रिया पूरी करते हुए कुल 23 हजार रुपए जमा किए। इसके बाद जिला कारागार के मुख्य जेलर ऋतिक प्रियदर्शी और डिप्टी जेलर वीरेंद्र सिंह की मौजूदगी में आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर पांचों बंदियों को रिहा किया गया।
रिहा होने वालों में अकबर अली पुत्र जैनुलअवदीन का एक हजार रुपए, सचिन कुमार पुत्र राजेन्द्र कुमार का 10 हजार रुपए, मुकीम पुत्र शहजाद का एक हजार रुपए, सत्यम पुत्र सच्चिदानन्द का एक हजार रुपए तथा सिद्धार्थ उर्फ सिद्धि पुत्र बाल कुमार का 10 हजार रुपए अर्थदंड शामिल था। इस तरह कुल 23 हजार रुपए का अर्थदंड जमा कराया गया।इस मौके पर फोरम के वरिष्ठ पदाधिकारी शफीक चौधरी ने कहा कि संस्था का उद्देश्य धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठकर जरूरतमंद लोगों की सेवा करना है। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति केवल आर्थिक तंगी के कारण सजा पूरी होने के बाद भी सलाखों के पीछे न रहे, इसी मानवीय भावना के तहत यह पहल की गई है।
इंजीनियर मुहम्मद साकिब ने उम्मीद जताई कि रिहा हुए सभी लोग समाज की मुख्यधारा से जुड़कर सम्मानजनक जीवन व्यतीत करेंगे। कारागार अधिकारियों ने भी फोरम की पहल की सराहना करते हुए रिहा हुए बंदियों के बेहतर और अपराध-मुक्त भविष्य की कामना की। सामाजिक संस्थाओं द्वारा अर्थदंड जमा कर जरूरतमंद बंदियों की रिहाई में सहयोग की ऐसी पहल पहले भी सामने आती रही है।



