जिला अस्पताल की मनोचिकित्सकों ने दी चेतावनी—दो साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से रखें दूर, इंटरनेट से स्वयं इलाज करना पड़ सकता है भारी
अंकित यादव। बाराबंकी
आधुनिक जीवनशैली में स्मार्टफोन लोगों की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसकी बढ़ती निर्भरता अब स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। जिला अस्पताल की मनोचिकित्सकों का कहना है कि स्मार्टफोन का अनियंत्रित उपयोग धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में इसके दुष्प्रभाव तेजी से सामने आ रहे हैं।

जिला अस्पताल में तैनात मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव और डॉ. नूपुर प्रिया पाण्डेय ने विशेष बातचीत में बताया कि स्मार्टफोन का सीमित और संतुलित उपयोग लाभकारी हो सकता है, लेकिन अत्यधिक स्क्रीन टाइम कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है। डॉ. आरती यादव के अनुसार लगातार मोबाइल देखने से आंखों में सूखापन, सिरदर्द, गर्दन और रीढ़ की हड्डी में दर्द (टेक्स्ट नेक), नींद की कमी तथा मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। बच्चों में स्क्रीन की लत, कमजोर दृष्टि, मोटापा, चिड़चिड़ापन और नींद संबंधी विकार तेजी से बढ़ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह भी है कि लोग किसी भी बीमारी के लक्षण दिखने पर चिकित्सक से परामर्श लेने के बजाय इंटरनेट पर जानकारी खोजकर स्वयं उपचार शुरू कर देते हैं। यह आदत कई बार गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है। उन्होंने सलाह दी कि किसी भी बीमारी के उपचार के लिए योग्य चिकित्सक की राय लेना ही सुरक्षित विकल्प है।
मनोचिकित्सक डॉ. नूपुर प्रिया पाण्डेय ने कहा कि सोते समय मोबाइल को तकिये के नीचे या सिरहाने रखकर सोना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। उन्होंने सलाह दी कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल का उपयोग बंद कर देना चाहिए और उसे बिस्तर से लगभग पांच फीट दूर रखना चाहिए। उनका कहना है कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी स्थिति में मोबाइल नहीं देना चाहिए और न ही उन्हें स्क्रीन दिखाई जानी चाहिए, क्योंकि इससे उनके मस्तिष्क और व्यवहारिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में तकनीक का उपयोग आवश्यकता तक सीमित रखते हुए स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ संवाद जैसी स्वस्थ आदतें अपनाकर स्मार्टफोन के दुष्प्रभावों से काफी हद तक बचा जा सकता है।










