JPSC-JSSC विवाद : जब परीक्षा न्याय भी राजनीति का विषय बन जाए

छात्र आंदोलन शायद ही कभी राजनीति से शुरू होते हैं। उनकी शुरुआत उम्मीद से होती है इस विश्वास के साथ कि वर्षों की मेहनत, परिवार के त्याग और सीमित संसाधनों के बीच की गई तैयारी का मूल्यांकन निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से होगा। लेकिन जब यही भरोसा टूटने लगता है, तो एक परीक्षा का विवाद धीरे-धीरे शासन और संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करने लगता है। झारखंड में जारी छात्र आंदोलन केवल कथित पेपर लीक या भर्ती अनियमितताओं का विरोध नहीं है, बल्कि यह उन संस्थाओं के प्रति गहराते अविश्वास का प्रतीक बन चुका है, जिन पर युवाओं के भविष्य की रक्षा की जिम्मेदारी है।इस विवाद ने एक और असहज राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है। आखिर ऐसा क्यों है कि कुछ परीक्षा घोटाले राष्ट्रीय आंदोलन, राजनीतिक अभियानों और लगातार मीडिया कवरेज का विषय बन जाते हैं, जबकि कुछ दूसरे विवाद उसी राज्य की सीमाओं तक सिमटकर रह जाते हैं? झारखंड में प्रदर्शन कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए यह मुद्दा अब केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। उनके लिए यह सवाल जवाबदेही, राजनीतिक एकजुटता और सार्वजनिक आक्रोश के समान मानदंडों का है।

राष्ट्रीय समर्थन की तलाश में एक आंदोलन
झारखंड के प्रदर्शनकारी छात्रों को सबसे अधिक निराशा केवल भर्ती विवादों से नहीं, बल्कि इस बात से है कि उनके आंदोलन को वैसा राष्ट्रीय समर्थन नहीं मिला, जैसा देश के अन्य परीक्षा विवादों के दौरान देखने को मिला था।नीट परीक्षा को लेकर जब पूरे देश में विवाद हुआ, तब कई छात्र संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी दल सड़क पर उतरे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुए, प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गईं, केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकातें हुईं और यह मुद्दा कई सप्ताह तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना रहा।इसके विपरीत, झारखंड के अभ्यर्थियों का कहना है कि लगातार प्रदर्शन और भर्ती घोटालों की जांच के बावजूद उनके आंदोलन को वैसी राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली।
इसी संदर्भ में कुछ प्रदर्शनकारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जिस संगठन ने नीट विवाद के दौरान दिल्ली में सक्रिय आंदोलन किया, उसने झारखंड के मुद्दे पर अपनी भूमिका मुख्यतः सोशल मीडिया तक सीमित रखी और ज़मीनी स्तर पर वैसी सक्रियता नहीं दिखाई।ऐसे ही सवाल उन अन्य चेहरों पर भी उठ रहे हैं, जिन्होंने नीट विवाद के दौरान केंद्र सरकार के साथ छात्रों की ओर से बातचीत की थी। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि जिन्होंने पहले राष्ट्रीय स्तर पर छात्र हितों के लिए आवाज़ उठाई, उन्होंने झारखंड सरकार के समक्ष इसी प्रकार का अभियान या संवाद शुरू नहीं किया।

क्या जवाबदेही के भी अलग-अलग मानदंड हैं?
यह बहस अब केवल छात्र संगठनों या सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है।वे विपक्षी दल, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा घोटालों को लेकर केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए थे, अब उन्हीं पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि राज्यों में अपनी सहयोगी सरकारों के दौरान सामने आए भर्ती विवादों पर उनका रुख अपेक्षाकृत शांत रहा है।प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और संस्थागत सुधार की मांग किसी सरकार के आधार पर बदलनी नहीं चाहिए। यदि ये मांगें केंद्र सरकार के मामलों में उचित हैं, तो राज्य सरकारों के मामलों में भी उतनी ही उचित होनी चाहिए।झारखंड का आंदोलन इसी कथित दोहरे मापदंड पर सवाल खड़ा कर रहा है।

स्वतंत्र जांच की मांग
आंदोलन की सबसे प्रमुख मांगों में से एक स्वतंत्र जांच है।कई अभ्यर्थियों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्हें राज्य स्तर पर चल रही जांचों पर पर्याप्त भरोसा नहीं है। उनका मानना है कि इतने गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सौंपा जाना चाहिए, ताकि जांच की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास कायम हो सके।उनकी यह मांग पिछले अनुभवों से भी जुड़ी है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि राज्य में पहले भी कई भर्ती विवादों में वास्तविक प्रगति तब हुई, जब झारखंड उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। यही कारण है कि वे इस बार भी एक स्वतंत्र और संस्थागत रूप से निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

सालों से चली आ रही समस्या
मौजूदा आंदोलन किसी एक घटना का परिणाम नहीं है।अभ्यर्थियों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से आयोजित विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, उत्तर पुस्तिकाओं में कथित छेड़छाड़, ओएमआर मूल्यांकन में गड़बड़ी और उत्तर कुंजी से जुड़े विवाद लगातार सामने आते रहे हैं।प्रदर्शनकारियों का यह भी दावा है कि कुछ मामलों में बेहद कम प्रश्न हल करने वाले अभ्यर्थियों को भी असामान्य रूप से अधिक अंक मिले। इसी कारण वे ओएमआर शीट में “नॉट अटेम्प्टेड” (Not Attempted) का एक मानकीकृत विकल्प जोड़ने की मांग कर रहे हैं, ताकि परीक्षा के बाद संभावित छेड़छाड़ की आशंका कम हो सके।इसके साथ ही यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जिन निजी एजेंसियों और वेंडरों को पहले भी परीक्षा प्रक्रियाओं को लेकर विवादों का सामना करना पड़ा था, उन्हें बार-बार संवेदनशील जिम्मेदारियाँ क्यों सौंपी जाती रहीं।

आंकड़ों के पीछे छिपी मानवीय कहानी
हर भर्ती घोटाले के पीछे किसी न किसी युवा का अधूरा सपना होता है।प्रदर्शन में शामिल अधिकांश अभ्यर्थी गिरिडीह, पलामू, लातेहार जैसे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर जिलों से आते हैं। इनमें से कई किसान परिवारों से हैं, जिनके लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी पूरे परिवार के वर्षों के त्याग, कर्ज और उम्मीदों का परिणाम होती है।ऐसे में हर रद्द हुई परीक्षा, हर टली हुई भर्ती और हर कथित अनियमितता केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं होती, बल्कि उनके जीवन का एक और महत्वपूर्ण वर्ष छीन लेती है। उम्र सीमा, आर्थिक दबाव और रोजगार के सीमित अवसर इस पीड़ा को और गहरा कर देते हैं।दुर्भाग्य से, परीक्षा घोटालों की राजनीतिक बहस में यह मानवीय पक्ष अक्सर सबसे कम दिखाई देता है।

जवाबदेही चयनात्मक नहीं हो सकती
इस आंदोलन ने राजनीतिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।झारखंड की वर्तमान सरकार युवाओं को रोजगार और पारदर्शी शासन का भरोसा देकर सत्ता में आई थी। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि लगातार सामने आ रहे भर्ती विवाद उन वादों के अनुरूप नहीं दिखाई देते। उनका यह भी आरोप है कि जांच, गिरफ्तारियों और कथित अनियमितताओं के बावजूद अब तक किसी वरिष्ठ मंत्री या परीक्षा से जुड़े उच्च अधिकारी ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है।इन मांगों का क्या परिणाम निकलेगा, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केवल जांच बैठा देने से जनता का विश्वास वापस नहीं आएगा। इसके लिए जवाबदेही दिखाई भी देनी चाहिए।

राजनीति से कहीं बड़ा सवाल
आखिरकार, झारखंड का भर्ती विवाद केवल एक परीक्षा या एक सरकार का मामला नहीं है।यह भारतीय लोकतंत्र के एक बुनियादी सिद्धांत से जुड़ा प्रश्न है। छात्रों के अधिकार राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय नहीं हो सकते। परीक्षा घोटालों पर जनाक्रोश इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि सत्ता दिल्ली में किसके पास है या किसी राज्य की राजधानी में। भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता हर जगह समान रूप से महत्वपूर्ण है।रांची में लगातार प्रदर्शन कर रहे हजारों युवाओं की मांग असाधारण नहीं है। वे किसी विशेष रियायत की अपेक्षा नहीं कर रहे। वे केवल वही चाहते हैं, जिसका वादा हर प्रतियोगी परीक्षा करती है एक निष्पक्ष अवसर, पारदर्शी व्यवस्था और ऐसी जवाबदेही, जो सत्ता बदलने के साथ अपने मानदंड न बदले।

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