जेन ज़ी का असंतोष: क्या बदल रही है दुनिया की राजनीति?

बांग्लादेश और नेपाल में सत्ता परिवर्तन, यूरोप में सड़कों पर उतरते छात्र और भारत में अवसरों को लेकर उठते प्रश्न—इन घटनाओं को केवल युवाओं का गुस्सा कहकर नहीं समझा जा सकता। इनके केंद्र में नागरिक और व्यवस्था के बीच भरोसे का प्रश्न है।
रुद्र प्रताप सिंह
किसी समाज में युवा जब सड़क पर उतरते हैं, तो पहली प्रतिक्रिया अक्सर यही होती है कि वे अधीर हैं। दूसरी प्रतिक्रिया होती है कि सोशल मीडिया ने उन्हें भड़का दिया है। संभव है किसी आंदोलन में अधीरता भी हो और भ्रामक सूचनाएँ भी फैलें। लेकिन इन बातों से वह मूल प्रश्न समाप्त नहीं होता जिसके कारण हजारों लोग अपना समय, पढ़ाई और सुरक्षा दाँव पर लगाते हैं: क्या मेहनत करने वाले युवा को उसकी योग्यता के अनुरूप अवसर मिलेगा, और अन्याय होने पर क्या संस्था उसकी बात सुनेगी?
आज इस प्रश्न के साथ ‘जेन ज़ी’ का नाम जुड़ गया है। सामान्यतः 1997 के बाद जन्मे लोगों को इस पीढ़ी में रखा जाता है, हालांकि पीढ़ियों की सीमाएँ निश्चित नहीं हैं। मोबाइल और इंटरनेट के साथ बड़े होने का अर्थ यह नहीं कि इस पीढ़ी के सभी लोग एक जैसा सोचते हैं। महानगर के संपन्न छात्र और गाँव की नौकरी खोजती युवती एक ही पीढ़ी के हो सकते हैं, पर उनके सामने खड़ी बाधाएँ बहुत अलग हैं। इसलिए ‘जेन ज़ी आंदोलन’ एक उपयोगी संकेत भर है; वह किसी देश के आंदोलन का पूरा विश्लेषण नहीं है।
छोटी चिंगारी, पुराना असंतोष
बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन की शुरुआत सरकारी नौकरियों के आरक्षण संबंधी विवाद से हुई। यह मुद्दा केवल नौकरी पाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा। जब प्रदर्शनकारियों पर कठोर कार्रवाई हुई, तो निष्पक्षता की माँग सत्ता की जवाबदेही के प्रश्न में बदल गई। आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार का अंत हुआ। संयुक्त राष्ट्र की जाँच ने उस दौर में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को दर्ज किया। बांग्लादेश दिखाता है कि किसी एक नीति पर विरोध तब व्यापक राजनीतिक आंदोलन बन सकता है, जब नागरिकों को लगे कि शिकायत सुनने के सामान्य रास्ते बंद हैं।
नेपाल में सितंबर 2025 के प्रदर्शनों का तत्काल कारण सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिबंध था। पर युवाओं का रोष भ्रष्टाचार, अवसरों की कमी और राजनीतिक वर्ग के आचरण से भी जुड़ा था। प्रदर्शन हिंसक हुए, लोगों की जान गई, प्रतिबंध हटाना पड़ा और प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली ने इस्तीफा दिया। इसलिए नेपाल की घटना को ‘इंटरनेट के लिए आंदोलन’ कहना अधूरा विवरण होगा। सवाल यह था कि आम युवा से नियमों का पालन अपेक्षित हो, जबकि प्रभावशाली लोगों के लिए जवाबदेही कमजोर दिखाई दे, तो व्यवस्था की वैधता कितने समय तक बनी रह सकती है?
दोनों देशों में सत्ता पर तत्काल प्रभाव दिखा। किंतु सत्ता परिवर्तन को व्यवस्था परिवर्तन मान लेना जल्दबाजी होगी। युवाओं की माँग यदि निष्पक्ष भर्ती, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई और सम्मानजनक जीवन की है, तो सरकार बदलने के बाद भी उन्हें संस्थाओं के कामकाज में उसका प्रमाण चाहिए। आंदोलन दरवाजा खोल सकता है; भरोसेमंद शासन का निर्माण उसके बाद शुरू होता है।
समृद्ध यूरोप में भी भविष्य की चिंता
यूरोप की परिस्थितियाँ दक्षिण एशिया से अलग हैं, फिर भी वहाँ युवाओं की बेचैनी को केवल बाहरी देशों की समस्या कहकर नहीं टाला जा सकता। सर्बिया में 2024 की रेल स्टेशन दुर्घटना के बाद छात्रों का विरोध सार्वजनिक कार्यों में जवाबदेही और पारदर्शिता की माँग से जुड़ा। यूरोपीय आयोग ने भी वहाँ भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष और समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण का उल्लेख किया है। यूरोप के अन्य हिस्सों में शिक्षा की गुणवत्ता, महँगा आवास और काम के अवसर युवाओं की चिंता के विषय हैं। इन सब आंदोलनों का नेतृत्व, उद्देश्य और राजनीतिक संदर्भ एक नहीं है; साझा तत्व भविष्य को लेकर अनिश्चितता है।
आँकड़े इस चिंता को आधार देते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार 2025 में दुनिया के 15 से 24 वर्ष के लगभग 6.7 करोड़ युवा बेरोजगार थे और वैश्विक युवा बेरोजगारी दर 12.4 प्रतिशत थी। उसी वर्ष 25.7 करोड़ से अधिक युवा, अर्थात लगभग 20 प्रतिशत, न रोजगार में थे, न शिक्षा या प्रशिक्षण में। उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप में युवा बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत थी। ये आँकड़े जेन ज़ी की पूरी आयु-सीमा के नहीं, बल्कि 15–24 वर्ष के युवाओं के हैं; फिर भी वे बताते हैं कि भविष्य को लेकर असुरक्षा केवल गरीब देशों का प्रश्न नहीं है।
यहाँ एक और अंतर समझना चाहिए। रोजगार मिलना और अच्छा रोजगार मिलना एक बात नहीं है। अस्थायी काम, कम आय और अपनी शिक्षा के अनुरूप अवसर न मिलना भी युवाओं के फैसलों को प्रभावित करते हैं। जब स्वतंत्र जीवन शुरू करना कठिन हो, आवास वहन करना मुश्किल हो और अगला कदम अनिश्चित लगे, तब आर्थिक समस्या धीरे-धीरे सामाजिक तथा राजनीतिक प्रश्न बन जाती है।
भारत को क्या पढ़ना चाहिए?
भारत में नेपाल या बांग्लादेश जैसी स्थिति की घोषणा करना तथ्यपूर्ण विश्लेषण नहीं होगा। भारत का आकार, लोकतांत्रिक ढाँचा और सामाजिक परिस्थितियाँ अलग हैं। लेकिन इससे यहाँ के युवाओं की शिकायतें छोटी नहीं हो जातीं। किसी छात्र के लिए परीक्षा की शुचिता पर संदेह उसके वर्षों की तैयारी पर प्रश्न है। भर्ती में देरी उसके परिवार के आर्थिक निर्णय रोक सकती है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उपयुक्त काम न मिलना केवल आय की कमी नहीं, आत्मविश्वास और व्यवस्था पर भरोसे की भी चोट है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की भारत रोजगार रिपोर्ट युवा रोजगार, शिक्षा और कौशल के बीच के अंतर को एक प्रमुख चुनौती के रूप में देखती है।
नीतिगत चर्चा में अक्सर ‘युवा’ से आशय कोचिंग संस्थान या विश्वविद्यालय का छात्र मान लिया जाता है। किंतु एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो पढ़ाई के साथ काम करते हैं, खेती या पारिवारिक व्यवसाय में लगे हैं, छोटे कस्बों में अवसर खोजते हैं या घरेलू जिम्मेदारियों के कारण नौकरी के लिए उपलब्ध ही नहीं हो पाते। युवतियों की बाधाएँ भी एक जैसी नहीं हैं। यदि संवाद केवल मंच पर बोल सकने वाले युवाओं से होगा, तो सबसे कम सुने जाने वालों की समस्याएँ आँकड़ों और भाषणों में दब जाएँगी।
भारत के लिए व्यावहारिक कसौटी स्पष्ट है: परीक्षाओं और भर्तियों का विश्वसनीय संचालन, शिकायतों की समयबद्ध जाँच, संस्थाओं के निर्णयों में पारदर्शिता और शिक्षा से काम तक बेहतर रास्ता। हर युवा को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है; हर योग्य अभ्यर्थी को निष्पक्ष प्रक्रिया देना अवश्य संभव होना चाहिए।
डिजिटल शक्ति की सीमा
जेन ज़ी के पास संगठित होने और सूचना फैलाने की ऐसी क्षमता है जो पिछली पीढ़ियों के पास नहीं थी। इससे किसी स्थानीय शिकायत को देशव्यापी चर्चा मिल सकती है। यही गति जोखिम भी पैदा करती है। अपुष्ट आरोप, बदली हुई तस्वीरें और उत्तेजक संदेश आंदोलन की विश्वसनीयता को हानि पहुँचाते हैं। शांतिपूर्ण विरोध के बीच हिंसा प्रवेश करे, तो मूल माँग पीछे छूट सकती है और उसकी कीमत सामान्य नागरिक भी चुकाते हैं।
युवाओं की जिम्मेदारी तथ्यों की जाँच, स्पष्ट माँग और अहिंसक अनुशासन है। सरकार की जिम्मेदारी शांतिपूर्ण असहमति को सुनना तथा बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र और विश्वसनीय जाँच करना है। संवाद तभी सार्थक होगा जब शिकायत को केवल ‘विपक्ष की राजनीति’ या ‘बच्चों की नासमझी’ कहकर खारिज न किया जाए।
आगे की संभावना
जेन ज़ी दुनिया में एक समान राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरेगी, ऐसा कहना अभी संभव नहीं है। देशों के भीतर भी युवाओं के विचार, हित और प्राथमिकताएँ भिन्न हैं। कुछ आंदोलन नई राजनीतिक नेतृत्व-शक्ति पैदा कर सकते हैं; कुछ किसी विशेष नीति में सुधार तक सीमित रहेंगे; कुछ स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव में बिखर भी सकते हैं। परिणाम इस पर निर्भर करेगा कि युवा अपनी माँगों को कितनी ठोस दिशा देते हैं और संस्थाएँ उनका कितना विश्वसनीय उत्तर देती हैं।
दुनिया भर के घटनाक्रम में एक चेतावनी अवश्य है। यदि शिक्षा आशा पैदा करे, पर अर्थव्यवस्था अवसर न दे; यदि कानून समानता का वादा करे, पर प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण लगे; यदि सरकार संवाद की बात करे, पर शिकायत का उत्तर न मिले—तो असंतोष जमा होता है। उसका समाधान युवाओं को चुप कराना नहीं, उन कारणों को दूर करना है जिनसे भरोसा कमजोर पड़ा है।
जेन ज़ी से असहमति हो सकती है; उसके हर तरीके का समर्थन करना भी आवश्यक नहीं। लेकिन उसके प्रश्न को सुनना आवश्यक है। किसी लोकतंत्र की मजबूती केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वहाँ कितने युवा बोल रहे हैं। वह इस बात से भी मापी जाती है कि उनके उचित प्रश्नों पर व्यवस्था क्या करती है।



