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28 साल बाद भी हॉकी विश्व कप में नहीं होगा कोई भारतीय अंपायर, दिग्गजों ने जताई चिंता

1998 में नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में खेले गए विश्व कप के बाद यह पहला अवसर है, जब भारत का कोई प्रतिनिधि इस भूमिका में नहीं होगा। रघु प्रसाद, सतिंदर शर्मा और अमरजीत बावा ने चिंता का विषय बताते हुए कहा- प्रतिभा की…

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28 साल बाद भी हॉकी विश्व कप में नहीं होगा कोई भारतीय अंपायर, दिग्गजों ने जताई चिंता
28 साल बाद भी हॉकी विश्व कप में नहीं होगा कोई भारतीय अंपायर, दिग्गजों ने जताई चिंता

1998 में नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में खेले गए विश्व कप के बाद यह पहला अवसर है, जब भारत का कोई प्रतिनिधि इस भूमिका में नहीं होगा।

रघु प्रसाद, सतिंदर शर्मा और अमरजीत बावा ने चिंता का विषय बताते हुए कहा- प्रतिभा की नहीं, अवसर और बेहतर व्यवस्था की कमी; अंपायरों को अंतरराष्ट्रीय मंच व आर्थिक सुरक्षा देने की जरूरत

 

नई दिल्ली । करीब तीन दशक बाद हॉकी विश्व कप में भारत का कोई भी अंपायर या तकनीकी अधिकारी नजर नहीं आएगा। 15 अगस्त से नीदरलैंड और बेल्जियम में शुरू हो रहे एफआईएच हॉकी विश्व कप के लिए घोषित अंपायरों और तकनीकी अधिकारियों की सूची में किसी भी भारतीय का नाम शामिल नहीं है। 1998 में नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में खेले गए विश्व कप के बाद यह पहला अवसर है, जब भारत का कोई प्रतिनिधि इस भूमिका में नहीं होगा।भारतीय हॉकी के वरिष्ठ अंपायरों ने इसे चिंता का विषय बताते हुए कहा कि केवल अंपायरों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनकी गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और आर्थिक सुरक्षा पर गंभीरता से काम करना होगा।

भारत के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायर आर.वी. रघु प्रसाद, जिन्होंने 2010, 2014, 2018 और 2023 विश्व कप में अंपायरिंग की, ने कहा कि बड़े टूर्नामेंटों के लिए चयन एफआईएच अंपायरिंग समिति करती है। चयन का आधार प्रो लीग और अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन होता है। ऐसे में भारतीय अंपायरों को अधिक अंतरराष्ट्रीय अवसर मिलने चाहिए।कई ओलंपिक और विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके सतिंदर शर्मा ने कहा कि अमरजीत सिंह बावा और तरलोक सिंह भुल्लर के बाद उन्होंने और रघु प्रसाद ने वैश्विक स्तर पर भारतीय अंपायरिंग की पहचान बनाई थी। उन्होंने याद दिलाया कि 2008 बीजिंग ओलंपिक में भारतीय टीम क्वालीफाई नहीं कर सकी थी, लेकिन वह अकेले भारतीय अधिकारी के रूप में वहां मौजूद थे। उनके अनुसार चयन के लिए अनुभव और प्रदर्शन में निरंतरता सबसे महत्वपूर्ण है और इसी क्षेत्र में भारत पिछड़ रहा है।

हॉकी इंडिया की मई 2025 तक अपडेट सूची के अनुसार पुरुष वर्ग में छह और महिला वर्ग में चार एफआईएच पैनल अंपायर हैं। हालांकि रघु प्रसाद के पिछले वर्ष संन्यास लेने के बाद पुरुष वर्ग में अनुभवी अंतरराष्ट्रीय अंपायरों की संख्या और कम हो गई है। तकनीकी अधिकारियों में भी एफआईएच पैनल में भारतीय प्रतिनिधित्व सीमित है।सतिंदर शर्मा ने कहा कि भारतीय अंपायरों को घरेलू प्रतियोगिताओं के साथ-साथ बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भी अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय टीमों के प्रशिक्षण शिविरों में भी अंपायरों को शामिल किया जाए, ताकि उन्हें आधुनिक खेल शैली और अंतरराष्ट्रीय मानकों का बेहतर अनुभव मिल सके। उनका कहना था कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सही मार्गदर्शन, योजना और महासंघ के सहयोग की आवश्यकता है।

1990 विश्व कप और 1988 सियोल ओलंपिक में अंपायरिंग कर चुके अमरजीत सिंह बावा ने कहा कि उनके दौर में अंपायरों को खेल का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं माना जाता था। उन्होंने बताया कि उस समय अंपायरों को केवल 20 रुपये प्रतिदिन भत्ता मिलता था, जिसे बाद में बढ़ाकर 100 रुपये कराया गया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित कराया कि खिलाड़ियों की तरह अंपायरों को भी सम्मान और स्मृति चिन्ह दिए जाएं।

तीनों पूर्व अंपायरों ने माना कि इस पेशे में आर्थिक सुरक्षा का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। सतिंदर शर्मा ने कहा कि उनके समय में घरेलू प्रतियोगिताओं में बेहद कम भत्ता मिलता था और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भी सीमित दैनिक भत्ता ही दिया जाता था। अधिकांश अंपायरों के पास स्थायी रोजगार नहीं है और उन्हें घरेलू प्रतियोगिताओं पर ही निर्भर रहना पड़ता है।रघु प्रसाद ने कहा कि उन्होंने अपने करियर के दौरान पूरी तरह अंपायरिंग पर ध्यान दिया और नौकरी के बारे में नहीं सोचा। संन्यास के बाद उन्हें काफी प्रयासों के बाद निजी क्षेत्र में रोजगार मिला। उन्होंने कहा कि यदि अंपायरों को सम्मान, पुरस्कार और रोजगार की सुरक्षा नहीं मिलेगी तो युवा इस पेशे को करियर के रूप में अपनाने से हिचकेंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन पर पुरस्कार और सरकारी नौकरियां मिलती हैं, जबकि अंपायरों को न तो पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है और न ही करियर सुरक्षा। कई बार नौकरीपेशा अंपायरों को प्रतियोगिताओं के लिए अवकाश तक नहीं मिल पाता। एक महिला तकनीकी अधिकारी ने भी पक्षपात और संस्थागत सहयोग की कमी को अंपायरों की प्रगति में बड़ी बाधा बताया।पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायरों का मानना है कि यदि भारतीय हॉकी को भविष्य के विश्व कप और ओलंपिक में अंपायरिंग और तकनीकी अधिकारियों के स्तर पर फिर से मजबूत प्रतिनिधित्व चाहिए, तो इसके लिए दीर्घकालिक योजना, बेहतर प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। तभी भारत एक बार फिर वैश्विक हॉकी मंच पर अंपायरिंग में अपनी मजबूत पहचान कायम कर सकेगा।