अल्ट्रा प्ले द्वारा देव आनंद की 103वीं जयंती पर उनकी सदाबहार फिल्मों की सौगात

वीकेंड में ओटीटी पर छायेगा सदाबहार देव आनंद का जादू
मुंबई । कई पीढ़ियां आईं और गईं, लेकिन देव आनंद का आकर्षण सदाबहार है और हमेशा उनका जादू बना रहेगा। अल्ट्रा प्ले और अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट, हिंदी सिनेमा के सबसे चहेते और सदाबहार स्टार देव आनंद की 103वीं जयंती (26 सितंबर) के मौके पर उनकी मशहूर फिल्में दिखाकर उनकी यादगार विरासत का जश्न मना रहे हैं। इस मौके पर दर्शकों को इस महान अभिनेता, निर्माता और फिल्मकार के काम को फिर से देखने का मौका मिलेगा। यह सिनेमा के शौकीनों की नई पीढ़ी को उनके अनोखे अभिनय अंदाज, यादगार परफॉर्मेंस और संगीत की विरासत से परिचित कराने की एक कोशिश है।
इस खास कलेक्शन में देव आनंद की कुछ सबसे यादगार फिल्में शामिल होंगी, जैसे असली नकली, तेरे घर के सामने, गाइड, सीआईडी, हम दोनों, जाली नोट, मंजिल, द रिटर्न ऑफ द ज्वेल थीफ, टैक्सी ड्राइवर, वारंट और बारिश।
अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ग्रुप के फाउंडर और सीईओ, सुशीलकुमार अग्रवाल ने कहा, ‘देव आनंद सिर्फ एक एवरग्रीन स्टार नहीं थे, वे जवानी, स्टाइल और कहानी कहने के उस अंदाज की मिसाल थे जो आज भी दर्शकों को जोड़े रखता है। यह उनके फैन्स के लिए देव आनंद की क्लासिक फिल्मों के साथ नई यादें बनाने और नई पीढ़ी के लिए उनकी फिल्मों के जादू को जानने का एक शानदार मौका है।
गाइड (1965) जैसी फिल्में, जिन्हें देव आनंद की सबसे यादगार परफॉर्मेंस में से एक माना जाता है, राजू नाम के एक टूरिस्ट गाइड की कहानी है। उसकी जिंदगी प्यार, महत्वाकांक्षा, असफलता और सुधार के सफर से गुजरती है। फिल्म के संगीत, कहानी और एक्टिंग ने इसे हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में जगह दिलाई है।
द रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ (1967) में मिस्ट्री, ग्लैमर और सस्पेंस का मेल है, जिसमें देव आनंद का स्क्रीन पर अब तक का सबसे स्टाइलिश अंदाज देखने को मिलता है। अपने शानदार संगीत से लेकर उलझी हुई कहानी तक, यह फिल्म उस दौर की बेहतरीन थ्रिलर फिल्मों में से एक मानी जाती है।
सीआईडी (1956) एक क्राइम थ्रिलर फिल्म थी जिसमें देव आनंद ने सस्पेंस, रोमांस और यादगार संगीत का बेहतरीन तालमेल दिखाया। यह फिल्म एक्टर के करियर का एक अहम पड़ाव भी बनी और 1950 के दशक के स्टाइलिश नॉयर-स्टाइल सिनेमा से गहराई से जुड़ी रही।
टैक्सी ड्राइवर (1954) देव आनंद के करियर के शुरुआती दौर की एक अहम फिल्म है, जब उनकी खास स्क्रीन पर्सनैलिटी ने उन्हें हिंदी सिनेमा के बड़े स्टार्स में से एक के तौर पर स्थापित करना शुरू किया था।
हम दोनों (1961) देव आनंद द्वारा प्रोड्यूस की गई फिल्म है। यह फिल्म दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत की पृष्ठभूमि पर बनी है, जिसमें वे एक बेफिक्र इंसान का किरदार निभाते हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा में पोस्टिंग के समय उनकी मुलाकात मेजर वर्मा से होती है, जो बिल्कुल उन्हीं की तरह दिखते हैं। यह एक इमोशनल रोलर-कोस्टर है, जो दर्शकों को इंसानी जज़्बातों और युद्ध का मन पर पड़ने वाले असर के सफर पर ले जाती है।
एक्टिंग के अलावा, देव आनंद का योगदान फिल्म मेकिंग और प्रोडक्शन में भी रहा। अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए, उन्होंने ऐसी फिल्में बनाने में मदद की जिन्होंने नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया और हिंदी सिनेमा को नई आवाजें और नजरिए दिए।
उनकी तरह ही फिल्में लोकप्रिय हैं, उनके गाने पॉपुलर कल्चर का हिस्सा बने हुए हैं, और नई पीढ़ी रील्स और दूसरे सोशल मीडिया के जरिए उन्हें जान रही है। वे उन दर्शकों को भी पहचान में आते हैं जिनका जन्म उनकी कई फिल्मों के रिलीज होने के समय हुआ भी नहीं था।



