चुनावी माहौल में ऐसे दावों और प्रतिदावों के बीच सच क्या है, यह मतदाताओं के लिए अहम सवाल बना हुआ है।

पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी के बीच नरेंद्र मोदी की हल्दिया रैली के बाद सियासी विवाद तेज़ हो गया है। 9 अप्रैल को आयोजित इस रैली में प्रधानमंत्री ने भारतीय जनता पार्टी के ‘पोरिबर्तन’ अभियान को आगे बढ़ाते हुए राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने छह ‘मोदी गारंटी’ की घोषणा करते हुए दावा किया कि देश तेज़ी से विकास कर रहा है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल पिछड़ रहा है।

रैली में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य में उद्योग ठप हो रहे हैं, युवाओं का पलायन बढ़ रहा है, महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई है और केंद्र सरकार की योजनाओं का नाम बदलकर उनका श्रेय लिया जा रहा है। इन बयानों के सामने आते ही राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज़ हो गई।

तृणमूल कांग्रेस ने तुरंत पलटवार करते हुए इन दावों को भ्रामक बताया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर ‘7 पॉइंट रियलिटी चेक’ जारी किया। उन्होंने प्रधानमंत्री के हर आरोप को तथ्यों के साथ खारिज करने का दावा किया और कहा कि राज्य की उपलब्धियों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री के चुनावी बयानों पर सवाल उठे हैं। पिछले कई वर्षों से विपक्षी दल और स्वतंत्र फैक्ट-चेक संस्थाएं उनके भाषणों में किए गए दावों की सत्यता पर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण भी साफ़ दिखाई देता है, जहां समर्थक इन्हें विकास का विज़न बताते हैं, वहीं विरोधी इन्हें तथ्यों की गलत प्रस्तुति करार देते हैं।

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