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निर्माण से विकास तक : 12 वर्षों में भारत की बदलती तस्वीर

भारत के आर्थिक विकास की कहानी को अगर केवल जीडीपी, निवेश यासरकारी योजनाओं के आंकड़ों से समझने की कोशिश की जाए, तोतस्वीर अधूरी रह जाएगी। किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की असली ताकतइस बात में होती है कि उसके पास लोगों, सामान, ऊर्जा,…

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निर्माण से विकास तक : 12 वर्षों में भारत की बदलती तस्वीर

भारत के आर्थिक विकास की कहानी को अगर केवल जीडीपी, निवेश यासरकारी योजनाओं के आंकड़ों से समझने की कोशिश की जाए, तोतस्वीर अधूरी रह जाएगी। किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की असली ताकतइस बात में होती है कि उसके पास लोगों, सामान, ऊर्जा, पूंजी औरअवसरों को कितनी तेजी और कुशलता से आगे बढ़ाने की क्षमता है। पिछले करीब बारह वर्षों में भारत में इसी क्षमता को बड़े पैमाने पर मजबूतकरने की कोशिश दिखाई देती है। सड़क और रेलवे से लेकर बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा, पानी, स्वास्थ्य, स्टार्टअप औररक्षा उत्पादन तक कई क्षेत्रों में विस्तार एक साथ हुआ है। इसके साथ ही जीएसटी, श्रम सुधार, पुराने कानूनों को हटाने, बैंकिंग क्षेत्र के पुनर्पूंजीकरणऔर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए में कमी जैसे संस्थागतबदलावों ने भी अर्थव्यवस्था के संचालन के ढांचे को प्रभावित किया है।इस बदलाव को केवल नई परियोजनाओं की सूची के रूप में देखना शायदइसकी सबसे बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। असली सवाल यहहै कि क्या भारत अब उस बुनियादी क्षमता का निर्माण कर रहा है, जिसकीजरूरत एक बड़ी, अधिक औद्योगिक और अधिक वैश्विक अर्थव्यवस्थाको होगी।

कनेक्टिविटी से बदलती अर्थव्यवस्था
इस बदलाव की शुरुआत परिवहन से होती है। भारत के डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। 2014 से पहले देश में कोई परिचालन डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर नहीं था। आज पूर्वी और पश्चिमी डीएफसी मिलकर हजारों किलोमीटर का ऐसानेटवर्क तैयार कर चुके हैं, जिसका उद्देश्य माल ढुलाई को तेज औरअधिक कुशल बनाना है। इसका महत्व सिर्फ रेलवे ट्रैक की लंबाई में नहीं है। जब कोई मालगाड़ीयात्री ट्रेनों से अलग समर्पित कॉरिडोर पर चलती है, तो लॉजिस्टिक्स कासमय और लागत दोनों प्रभावित होते हैं। यही कॉरिडोर जब औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों से जुड़ता है, तो उसका असर पूरी सप्लाई चेन परपड़ता है। सड़कों के क्षेत्र में भी यही बदलाव दिखाई देता है। एक्सप्रेसवे नेटवर्क काविस्तार और चार लेन या उससे अधिक क्षमता वाले राष्ट्रीय राजमार्गों कीबढ़ती लंबाई भारत के परिवहन ढांचे को नया आकार दे रही है। एक किसान के लिए बेहतर सड़क का मतलब बाजार तक जल्दी पहुंच होसकता है। किसी निर्माता के लिए इसका मतलब कच्चे माल और तैयारउत्पाद की तेज आवाजाही है। किसी छोटे शहर के लिए यह निवेश औरनए व्यवसायों तक पहुंच का रास्ता बन सकता है। यानी सड़क अपने आप में अंतिम उपलब्धि नहीं है। उसकी असली कीमतउस आर्थिक गतिविधि में है जिसे वह संभव बनाती है।

भारत सिर्फ सड़क से नहीं जुड़ रहा
कनेक्टिविटी की यह कहानी सड़क और रेल तक सीमित नहीं है। 2014 के बाद भारत में परिचालन हवाई अड्डों की संख्या में उल्लेखनीयवृद्धि हुई है। उड़ान जैसी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं ने छोटे शहरों और अपेक्षाकृत कम जुड़े क्षेत्रों को विमानन नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की है। एक समय हवाई यात्रा मुख्य रूप से बड़े महानगरों तक सीमित मानी जातीथी। अब छोटे शहरों से हवाई संपर्क बढ़ने का अर्थ केवल यात्रियों के लिए सुविधा नहीं है। इससे पर्यटन, कारोबार, निवेश और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी अवसर मिलते हैं।इसी तरह अंतर्देशीय जलमार्गों को भी देश के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क काहिस्सा बनाने पर जोर बढ़ा है। बंदरगाहों की क्षमता में विस्तार, जलमार्गों का विकास और रेलवे-सड़क कनेक्टिविटी का एक साथ बढ़ना भारत कोअधिक एकीकृत परिवहन व्यवस्था की ओर ले जा सकता है।

ऊर्जा : विकास की अगली शर्त

किसी भी अर्थव्यवस्था का विस्तार विश्वसनीय ऊर्जा के बिना संभव नहीं है। पिछले वर्षों में भारत की बिजली उत्पादन क्षमता और ट्रांसमिशन नेटवर्क दोनों का विस्तार हुआ है। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भारत अब केवल पारंपरिक उद्योगों का विस्तार नहीं कर रहा, बल्कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, डेटा सेंटर, डिजिटल सेवाओं, सेमीकंडक्टर औरआधुनिक विनिर्माण जैसे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में भी आगे बढ़ना चाहता है।इसी के साथ ऊर्जा के स्रोतों में भी बदलाव आया है। 2014 में भारत की सौर क्षमता लगभग 2.6 गीगावाट के स्तर पर थी। इसकेबाद इसमें कई गुना वृद्धि हुई और आज सौर ऊर्जा भारत के ऊर्जा परिदृश्यका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भी तेज विस्तार हुआ है। लेकिन यहां अगली चुनौती भी स्पष्ट है। सिर्फ सौर और पवन क्षमता जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। इस ऊर्जा को जरूरत वाली जगह तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क, स्टोरेज और ग्रिड प्रबंधन की क्षमता भी उसी गति से बढ़ानी होगी।

उद्योग और आत्मनिर्भरता का नया चरण
इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार औद्योगिक क्षमता के साथ मिलकर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। स्टील, कोयला और गैस पाइपलाइन नेटवर्क में वृद्धि इस दिशा मेंमहत्वपूर्ण है। स्टील की जरूरत सड़क, पुल, रेलवे, कारखानों औरमशीनरी से लेकर रक्षा उत्पादन तक लगभग हर बड़े औद्योगिक क्षेत्र मेंहोती है। इसी तरह ऊर्जा और गैस की उपलब्धता उद्योगों के विस्तार की बुनियादी जरूरत है।रक्षा क्षेत्र में बदलाव इस कहानी का एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के रक्षा निर्यात में पिछले वर्षों में तेज वृद्धि हुई है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, रक्षा निर्यात 2013-14 के करीब 686 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। यह केवल निर्यात का आंकड़ा नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि भारत घरेलू रक्षा उत्पादन की क्षमता बढ़ाने और वैश्विक रक्षा बाजार में अपनीहिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इसके परिणाम रक्षा क्षेत्र से बाहर भी दिखाई दे सकते हैं निजी उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप, अनुसंधान और उच्च-कौशल रोजगार के रूप में।

नौकरी खोजने वाली पीढ़ी से नौकरी पैदा करने वाली पीढ़ी तक?
भारत के आर्थिक बदलाव की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एकस्टार्टअप इकोसिस्टम की है। 2014 में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या लगभग 500 थी। आज यहसंख्या 2 लाख से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि केवल एक सरकारीयोजना की सफलता का आंकड़ा नहीं है। यह भारत की बदलतीउद्यमशील मानसिकता का संकेत भी है। आज का युवा केवल सरकारी नौकरी या पारंपरिक कॉरपोरेट रोजगार को ही सफलता का रास्ता नहीं मानता। टेक्नोलॉजी, फिनटेक, हेल्थटेक, ई-कॉमर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में नई कंपनियां उभर रही हैं। हालांकि, स्टार्टअप की संख्या बढ़ना और सफल व्यवसायों की संख्या बढ़ना एक ही बात नहीं है। असली चुनौती इन कंपनियों को टिकाऊ, रोजगार पैदा करने वाले और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी व्यवसायों में बदलने की होगी।

शहरों की बदलती रफ्तार
शहरी भारत में मेट्रो रेल का विस्तार भी इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है। 2014 में भारत में मेट्रो नेटवर्क सीमित शहरों तक था। आज यह कई शहरोंतक फैल चुका है और परिचालन नेटवर्क 1,000 किलोमीटर से आगेनिकल गया है। लेकिन किसी यात्री के लिए मेट्रो की असली उपलब्धि किलोमीटर नहीं है।वह रोज बचने वाला समय है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या किसी दूसरे बड़े शहर में रोजाना लंबीदूरी तय करने वाले व्यक्ति के लिए एक विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहनप्रणाली का अर्थ है कम अनिश्चितता, कम यात्रा समय और शहर में कामतथा आवास के बीच अधिक विकल्प। यही वह जगह है जहां इंफ्रास्ट्रक्चर सीधे जीवन की गुणवत्ता से जुड़ता है।

विकास का सबसे शांत बदलाव
कुछ बदलाव ऐसे हैं जिनकी तस्वीर टीवी स्क्रीन पर नहीं आती, लेकिनउनका असर घर के भीतर महसूस होता है। घरों तक पाइप से पानी पहुंचना इसका उदाहरण है। जल जीवन मिशन केबाद ग्रामीण परिवारों में नल के पानी की पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एक नल किसी सरकारी रिपोर्ट में सिर्फ एक कनेक्शन हो सकता है।लेकिन उस परिवार के लिए इसका अर्थ पानी भरने में लगने वाले घंटों कीबचत, महिलाओं पर कम बोझ और रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक सुविधाहो सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी इसी तरह विस्तार हुआ है। मेडिकल कॉलेजों, एमबीबीएस सीटों और एम्स संस्थानों की संख्या में वृद्धि ने देश की चिकित्साशिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे की क्षमता बढ़ाई है। इसका अंतिम लाभ तब दिखाई देगा जब ज्यादा डॉक्टर तैयार होंगे, विशेषज्ञ सेवाएं महानगरों से बाहर पहुंचेंगी और मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम होगी।

सिर्फ निर्माण नहीं, एक आर्थिक आधार
इन सभी क्षेत्रों को अलग-अलग देखने पर तस्वीर बिखरी हुई लग सकती है। लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है तो एक व्यापक बदलाव दिखाई देता है। एक फ्रेट कॉरिडोर बंदरगाह से जुड़ता है। बंदरगाह सड़क और रेल नेटवर्कसे जुड़ता है। उद्योग को बिजली और गैस चाहिए। उद्योग रोजगार पैदाकरता है। बेहतर कनेक्टिविटी बाजार खोलती है। स्टार्टअप नई सेवाएं और तकनीक लाते हैं। मेडिकल कॉलेज मानव पूंजी तैयार करते हैं। यानी इंफ्रास्ट्रक्चर की असली ताकत उसके नेटवर्क प्रभाव में है। इसीलिए पिछले बारह वर्षों की कहानी को केवल इस आधार पर नहींदेखा जाना चाहिए कि कितने किलोमीटर सड़क बनी, कितनी बिजली क्षमता जोड़ी गई या कितने संस्थान खोले गए। ज्यादा महत्वपूर्ण यह हैकि इन निवेशों से आर्थिक गतिविधि कितनी तेज और व्यापक होती है।

अगली चुनौती क्या है?

फिर भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। भारत में क्षेत्रीय असमानताएं अभी भी मौजूद हैं। कई शहर गंभीर ट्रैफिक और प्रदूषण से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता हर जगह समान नहीं है। बड़ी परियोजनाओं को जमीन, पर्यावरण, लागत और समय से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। और यह भी याद रखना जरूरी है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं राजनीतिक कार्यकाल की सीमाओं में नहीं बनतीं। किसी परियोजना की योजना पहले बनी हो सकती है, निर्माण बाद में हुआ हो और उसका उद्घाटन उससे भी बाद में। इसलिए हर उपलब्धि का श्रेय किसी एक अवधि को देना ऐतिहासिक रूप से हमेशा सटीक नहीं होगा। लेकिन इन सावधानियों के बावजूद पिछले बारह वर्षों में अलग-अलगक्षेत्रों में क्षमता निर्माण का पैमाना महत्वपूर्ण है।अब अगला सवाल निर्माण से उपयोग की ओर है।भारत ने सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, बिजली नेटवर्क, हवाई अड्डे, मेडिकल संस्थान और डिजिटल तथा औद्योगिक क्षमता का विस्तार किया है। अबचुनौती यह है कि इन परिसंपत्तियों को अधिक उत्पादकता, बेहतर रोजगार, मजबूत निर्यात और ऊंचे जीवन स्तर में बदला जाए। यही आने वाले दशक की असली परीक्षा होगी।

भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर दशक आखिरकार इस बात से तय नहीं होगा किकितने किलोमीटर जोड़े गए या कितने संस्थान बनाए गए। उसकामूल्यांकन इस आधार पर होगा कि इन निवेशों ने आम भारतीय के लिएकितने नए अवसर पैदा किए क्या यात्रा आसान हुई, क्या कारोबार तेजहुआ, क्या रोजगार बढ़ा, क्या इलाज और शिक्षा की पहुंच बेहतर हुई औरक्या देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में अधिक प्रतिस्पर्धी बन पाया।अगर पिछले बारह सालों को नींव तैयार करने का दौर कहा जाए, तोअगला चरण उस नींव पर आर्थिक अवसरों की इमारत खड़ी करने काहोगा। और शायद यही भारत के बदलते इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी कहानी हैदेश केवल अधिक निर्माण नहीं कर रहा, बल्कि एक ऐसी क्षमता तैयारकरने की कोशिश कर रहा है जिसके दम पर आने वाली पीढ़ियां एकअधिक जुड़ा हुआ, उत्पादक और अवसरों से भरा भारत देख सकें।