आस्था की अखंड ज्योति: उतरौला के प्राचीन मां ज्वाला देवी मंदिर में उमड़ रही श्रद्धा

मां के दरबार में शीश झुकाकर भक्त मांगते हैं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद
नवरात्र में भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना से भक्तिमय हुआ गांधी नगर
बी पी त्रिपाठी/अनिल कुमार गुप्ता
उतरौला (बलरामपुर)। कहीं घंटियों की मधुर ध्वनि, कहीं मां के जयकारों की गूंज, तो कहीं हाथों में फूल, नारियल और प्रसाद लिए दर्शन की प्रतीक्षा करते श्रद्धालु। शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में उतरौला नगर का वातावरण मां दुर्गा की भक्ति में सराबोर है। इसी आध्यात्मिक उल्लास के बीच नगर के गांधी नगर मोहल्ले में मुख्य मार्ग के किनारे स्थित श्री ज्वाला महारानी मंदिर श्रद्धा, विश्वास और आस्था की एक ऐसी ज्योति के रूप में चमक रहा है, जो वर्षों से भक्तों के मन में मां के प्रति अटूट विश्वास जगाती आ रही है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मां के चरणों में शीश झुकाकर अपने परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि श्री ज्वाला महारानी मंदिर उतरौला के प्राचीनतम धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर की स्थापना का प्रमाणिक काल भले ही स्पष्ट न हो, लेकिन इससे जुड़ी जनश्रुतियां, पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति और भक्तों की गहरी आस्था इसे नगर की विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती हैं। नवरात्र के दिनों में मंदिर का दृश्य और भी मनोहारी हो जाता है। मां के दर्शन की लालसा लेकर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के चेहरे पर भक्ति का भाव और मन में अपनी आराध्या के प्रति विश्वास सहज ही दिखाई देता है।
श्री ज्वाला महारानी मंदिर की महिमा से जुड़ी एक प्राचीन धार्मिक मान्यता प्रचलित है। कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किए जाने से आहत माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। पत्नी के वियोग में भगवान शिव अत्यंत व्याकुल हो उठे और उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया था।
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, माता सती के शरीर से निकली दिव्य अग्नि-ज्वाला इस स्थान पर गिरी और धरती को भेदती हुई पाताल तक चली गई। इसी मान्यता के आधार पर यहां मां ज्वाला महारानी की आराधना आरंभ होने की बात कही जाती है। कालांतर में यह स्थान भक्तों की श्रद्धा का केंद्र बन गया। इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, फिर भी स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसका विशेष महत्व है। भक्तों के लिए यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि मां की दिव्य शक्ति और उनकी कृपा में विश्वास का प्रतीक है।
बताया जाता है कि शुरुआती दौर में मंदिर का स्वरूप छोटा था, लेकिन भक्तों की बढ़ती श्रद्धा के साथ इसके विकास और पुनरुद्धार के प्रयास भी होते रहे। स्थानीय परंपरा के अनुसार, ननकू राम बैजनाथ की धर्मपत्नी सम्पदा देवी, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक भुजईन दाई के नाम से जानते हैं, ने मंदिर के व्यापक पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बाद में वर्तमान व्यवस्थापक अमर चन्द्र गुप्त ने स्थानीय श्रद्धालुओं और कुशल कारीगरों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कर उसे भव्य एवं आकर्षक रूप प्रदान किया। आज मंदिर का शिखर दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। मंदिर की साज-सज्जा और धार्मिक वातावरण के बीच पहुंचने वाले भक्तों को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति होती है। यहां की विशेषता केवल इसकी बनावट नहीं, बल्कि इससे जुड़ी वे स्मृतियां और परंपराएं भी हैं, जिन्हें स्थानीय लोग वर्षों से संजोए हुए हैं।
मंदिर में प्रतिदिन नियमित पूजा-अर्चना होती है। सुबह और शाम श्रद्धालु जल, पुष्प, नारियल और प्रसाद अर्पित कर मां के समक्ष अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं। मंदिर के ऊपरी हिस्से में लगे ग्रामोफोन से प्रातःकाल और संध्याकाल में गूंजने वाले देवी गीत वातावरण में भक्ति का रंग घोल देते हैं। भजनों की स्वर लहरियों के बीच मां के दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालु कुछ पल के लिए अपनी चिंताओं और व्यस्तताओं को भुलाकर आराधना में लीन हो जाते हैं।
सोमवार और शुक्रवार को मंदिर में विशेष चहल-पहल रहती है। इन दिनों बड़ी संख्या में भक्त मां के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और कड़ाह प्रसाद चढ़ाते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां के प्रति सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती। यही विश्वास भक्तों को बार-बार इस पवित्र स्थल तक खींच लाता है।
नवरात्र आते ही श्री ज्वाला महारानी मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। मुख्य द्वार और गर्भगृह को फूलों, रंग-बिरंगी झालरों तथा आकर्षक रोशनी से सजाया जाता है। दुर्गा सप्तशती के पाठ, अखंड ज्योति और भजन-कीर्तन के बीच पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है। मां के जयकारों से वातावरण गूंजने लगता है और दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है।
नौ दिनों तक व्रत रखने वाले भक्त मां की विधि-विधान से पूजा करते हैं। कई श्रद्धालु कन्या पूजन के साथ अपने धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करते हैं। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। किसी के हाथों में प्रसाद की थाली होती है, तो कोई परिवार के साथ मां के दरबार में हाजिरी लगाने आता है। हर श्रद्धालु के मन में अपनी आराध्या के प्रति श्रद्धा और आशीर्वाद पाने की अभिलाषा होती है।
मां के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भावनाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उनकी आस्था का केंद्र एक ही है। कोई परिवार में सुख-शांति की कामना करता है, कोई संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करता है, तो कोई कारोबार में उन्नति और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति की आस लेकर मां के चरणों में शीश झुकाता है। स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां ज्वाला देवी अवश्य पूरी करती हैं। यह लोगों का धार्मिक विश्वास है, जो वर्षों से मंदिर की परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है।
श्री ज्वाला महारानी मंदिर का महत्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। यह नगर की धार्मिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक भी है। मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियां, नियमित पूजा-पद्धति और नवरात्र में श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाजाही इस परंपरा की जीवंतता को दर्शाती हैं।
नवरात्र के इन पावन दिनों में जब चारों ओर मां दुर्गा की आराधना हो रही है, तब गांधी नगर स्थित श्री ज्वाला देवी मंदिर श्रद्धा और समर्पण का विशेष केंद्र बना हुआ है। यहां जलते दीप, गूंजते भजन और मां के चरणों में झुके श्रद्धालुओं के शीश एक ही संदेश देते हैं—आस्था केवल पूजा की विधि नहीं, बल्कि मन का वह विश्वास है, जो कठिन समय में भी इंसान को उम्मीद और संबल देता है। उतरौला का यह प्राचीन आस्था-स्थल इसी विश्वास के साथ भक्तों को मां की भक्ति से जोड़ रहा है।



