भारत में चुनाव लोकतंत्र का उत्सव हैं, लेकिन क्या लोकतंत्र की यह अनिवार्य प्रक्रिया शासन की निरंतरता पर भारी पड़ने लगे तो उस पर पुनर्विचार नहीं होना चाहिए? आज देश में चुनाव किसी एक निश्चित अवधि तक सीमित गतिविधि नहीं रह गए हैं। लोकसभा चुनाव के बाद किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव, फिर उपचुनाव और स्थानीय निकायों के चुनाव—यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। परिणाम यह है कि देश का राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र लंबे समय तक चुनावी मोड में बना रहता है। ऐसे में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर गंभीरता से विचार करना समय की मांग है।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत में एक साथ चुनाव कोई नई अवधारणा नहीं है। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ हुए। 1951-52 से लेकर 1967 तक देश में चुनावों का एक समन्वित चक्र रहा। बाद में कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण यह व्यवस्था टूट गई। आज स्थिति यह है कि देश में कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है।
सवाल यह नहीं कि चुनाव कम होने चाहिए। सवाल यह है कि क्या चुनावी व्यवस्था को इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है कि जनता का लोकतांत्रिक अधिकार भी अक्षुण्ण रहे और सरकारों को बिना बार-बार चुनावी दबाव के काम करने का पर्याप्त अवसर भी मिले?
‘एक देश, एक चुनाव’ का सबसे मजबूत पक्ष प्रशासनिक दक्षता है। चुनाव कराने में सरकारी मशीनरी का व्यापक इस्तेमाल होता है। लाखों कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी चुनावी जिम्मेदारियों में लगाए जाते हैं। जब देश के अलग-अलग हिस्सों में बार-बार चुनाव होते हैं, तो सरकारी संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रबंधन में लगा रहता है। यदि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक निर्धारित चक्र में एक साथ हों, तो इन संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
इसका सीधा संबंध शासन की निरंतरता से भी है। चुनावी आचार संहिता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए आवश्यक है, लेकिन लंबे समय तक या बार-बार आचार संहिता लागू रहने से नई घोषणाओं और कुछ सरकारी निर्णयों की गति प्रभावित हो सकती है। विकास की बड़ी परियोजनाएं पांच-दस वर्ष के दीर्घकालिक दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं, जबकि चुनावी राजनीति अक्सर तत्काल परिणामों पर केंद्रित होती है। इसलिए चुनाव और शासन के बीच एक संतुलित दूरी आवश्यक है।
दूसरा बड़ा प्रश्न चुनावी खर्च का है। चुनाव आज अत्यंत महंगी प्रक्रिया बन चुके हैं। राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों का खर्च अलग है, जबकि सरकार को सुरक्षा, परिवहन, मतदान केंद्र, कर्मचारियों और अन्य व्यवस्थाओं पर भारी सार्वजनिक धन खर्च करना पड़ता है। एक साथ चुनाव होने पर कुछ संसाधनों का साझा उपयोग संभव होगा और चुनावी प्रक्रिया की लागत कम की जा सकेगी।
लेकिन ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में तर्क देते समय इसके विरोध में उठने वाले सवालों को नजरअंदाज करना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। भारत केवल एक विशाल देश नहीं, बल्कि विविधताओं से भरा संघीय गणराज्य है। राज्यों के अपने मुद्दे हैं, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं और उनकी जनता के सामने स्थानीय प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने राष्ट्रीय मुद्दे। यह आशंका स्वाभाविक है कि एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के स्थानीय मुद्दों पर हावी न हो जाएं।
इस आशंका का समाधान चुनाव को टालने में नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने में है। मतदाता इतना सक्षम है कि वह लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग राजनीतिक निर्णय ले सकता है। भारत के चुनावी इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। इसलिए यह मान लेना कि एक साथ चुनाव होने का अर्थ एक ही दल को हर स्तर पर मतदान करना होगा, भारतीय मतदाता की राजनीतिक समझ को कम आंकना होगा।
फिर भी सबसे जटिल प्रश्न सरकारों के कार्यकाल से जुड़ा है। यदि किसी राज्य सरकार ने बहुमत खो दिया और विधानसभा समय से पहले भंग करनी पड़ी तो क्या होगा? यदि केंद्र में सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती तो चुनावी चक्र कैसे कायम रहेगा? इन प्रश्नों का समाधान संवैधानिक और राजनीतिक सहमति से ही संभव है। किसी भी नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार की स्थिरता के नाम पर जनता के जनादेश से समझौता न हो।
यही कारण है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ को किसी दल विशेष की सुविधा के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह मूलतः चुनावी सुधार और सुशासन से जुड़ा प्रश्न है। इसके लिए संसद में व्यापक चर्चा, राज्यों के साथ संवाद, संवैधानिक विशेषज्ञों की राय और राजनीतिक दलों के बीच सहमति जरूरी है। निर्वाचन आयोग की व्यावहारिक तैयारियों और संवैधानिक प्रावधानों का भी सूक्ष्म अध्ययन करना होगा।
भारत को ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें चुनाव भी मजबूत हों और शासन भी प्रभावी। लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने चुनाव हुए, बल्कि इससे भी कि चुनावों के बीच सरकारें कितनी प्रभावी ढंग से जनता के लिए काम कर पाईं।
‘एक देश, एक चुनाव’ यदि संवैधानिक मर्यादाओं, संघीय भावना और मतदाता के अधिकारों की रक्षा करते हुए लागू किया जाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार बन सकता है। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन सुशासन उसकी कसौटी। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
इसलिए ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बहस होनी चाहिए—लेकिन राजनीतिक नारों के स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, लोकतांत्रिक स्थिरता, प्रशासनिक दक्षता और विकास की निरंतरता के व्यापक संदर्भ में। यही इस बहस को सार्थक दिशा देगा।

लेखक: डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह
परिचय: पोस्ट डॉक्टोरल फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली)