नए वैचारिक विमर्श के आंदोलन की आवश्यकता

अमित त्यागी

(विधि एव प्रबंधन में परास्नातक लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राष्ट्रवादी विचारक हैं।)

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जेनजी ने अपना आंदोलन सफल कर लिया। सरकार और विपक्ष से हटकर देखें तो तंत्र के द्वारा लोक का शोषण निरंतर होता रहा है। इस्तीफा तो एक सांकेतिक पक्ष है, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर समग्र चिंतन की आवश्यकता है। मीडिया में धार्मिक मुद्दे, सोशल मीडिया पर कमेंटबाजी और वैश्विक देशों के मुद्दों पर अनावश्यक बहस में हम ऐसा उलझे कि लोकतन्त्र हमारे हाथ से फिसल गया। सभी राजनीतिक दलों में धीरे धीरे जनता का प्रतिनिधित्व खत्म हो गया। जनता से जुड़े नेता नेपथ्य में चले गए। लोकतन्त्र का वर्तमान स्वरूप कॉर्पोरेट के अनुसार हो चुका है। अब दलों में जनभावना के अनुसार निर्णय नहीं होते हैं बल्कि उच्च स्तर के आदेशों का पालन नीचे कराया जाता है। अब गांधी, लोहिया, दीनदयाल, अन्ना हज़ारे कोई नहीं बनना चाहता। प्रत्येक व्यक्ति तंत्र से जुड़ना चाहता है, क्योंकि तंत्र के माध्यम से वह सब कमाया जा सकता है जो अपने पुरूषार्थ एवं मेहनत से प्राप्त नहीं हो सकता है। लोक के माध्यम से धन नहीं कमाया जा सकता है किन्तु तंत्र के माध्यम से सम्पदा कमाई जा सकती है। तंत्र से सवाल पूछने वाले लोग भी तंत्र से जुड़ गए हैं और वह वहाँ स्थापित होकर गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। वह लोक की पीड़ा समझते हैं किन्तु स्व हितों के कारण तंत्र के आगे नतमस्तक है। सम्पूर्ण राजनीतिक तंत्र पिशाची प्रवृत्ति का हो गया है। चुनावों में राजनीतिक तंत्र के द्वारा लोक का मखौल बनाया जाने लगा है। लगभग सभी दलों में प्रत्याशी का चयन जनभावना के अनुरूप न होकर हाईकमान की सर परस्ती से होने लगा है, ऐसे में लोक का नेतृत्व करने वाले नेता अब नेपथ्य में चले गये हैं और हाईकमान की अनुकंपा वाले प्रसाद पाकर स्थापित होते जा रहे हैं। लोक का दुर्भाग्य है कि आज वह सिर्फ एक भीड़ बनकर रह गया है। इस भीड़ का एक भाग अब पक्ष में दिखता है और दूसरा विपक्ष में।

लोकतन्त्र पहले लीग मैचों की तरह था जिसमे चार पाँच दल आपस में प्रतिद्वंदिता रखते हुये विजय प्राप्त करते थे। एक उत्सव की तरह चुनाव होते थे और दो तीन महीने जनता इसका रसपान करती थी। अब सीधे दो पक्षों के बीच फ़ाइनल होने लगा है। इस नयी व्यवस्था का कारण स्पष्ट है कि भारत को अमेरिकी तर्ज़ पर ढाला जा चुका है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को प्रेरणास्रोत की तरह देखने वाली राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले दो दशक में भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था का उत्पीड़न करते हुये सुनियोजित तरीके से दो दलीय व्यवस्था स्थापित कर दी है। धन का मानक अन्य सभी सामाजिक मानकों पर अब सर्वोच्च है। एलेक्टोरल बॉन्ड भी इसी व्यवस्था से उपजा एक प्रारूप है। अब चुनावी चंदे का कॉर्पोरेट नाम एलेक्टोरल बॉन्ड है। राजनीतिक दलों में कार्यकर्ताओं को मशीन के पुर्जे की तरह उपयोग किया जा रहा है। पुर्जे बदलते रहो और मशीन चलती रहेगी। राजनीतिक दल अपने लूटतंत्र को छुपाते हुये जनता के बीच अपनी साख बचाने के लिए किसी भी स्तर पर अपने कार्यकर्ता को पुर्जे की तरह बदल देते हैं।

लोकतन्त्र में तंत्र लोक के लिए बनाया जाता है। हर चुनाव के बाद एक तंत्र बनता है। वह तंत्र उसी का शोषण करता है जो उसका निर्माण करता है। तंत्र को बनाने वाला लोक हर बार ठगा जाता है। जैसा लोक चाहता है वैसा तंत्र को कार्य करना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है ? शायद नहीं। तंत्र को नियंत्रित करने के साधन भी सीमित होते चले जा रहे हैं। तंत्र लगातार लोक की राह में रोड़ा बन रहा है। जो व्यवस्था अंग्रेजों ने अपने राज़ करने के लिए बनाई थी वह आज भी बरकरार है। या यूं कह सकते हैं कि पहले से ज़्यादा पैशाचिक रूप से बाहर आ गयी है। तंत्र और तंत्र से जुड़े लोग कभी नहीं चाहते हैं कि इस तंत्र को बदलने की कोई आवाज़ लोक से उठे। लोक से उठी हर आवाज़ को यह तंत्र या तो दबा देगा या किसी भी माध्यम से दबवा देगा। यह वही तंत्र है जिसे ब्रिटेन ने अपने ग़ुलाम देशों के शोषण के लिए बनाया था। इसी कारण लोक के धन पर लगातार तंत्र से जुड़ा एक छोटा सा देश ब्रिटेन लगातार अमीर होता जा रहा था और लोक से जुड़े उसके कब्जे वाले देश लगातार गरीब होते चले जा रहे थे। अब इसमे ब्रिटेन के स्थान पर राजनीतिक दलों के आलाकमान हैं और छोटे देशों के स्थान पर इन दलों के छोटे कार्यकर्ता है। यह तंत्र मालिक बनकर लोक को मजदूर बना रहा है। आज खेत लोक के हैं किन्तु उसकी कीमत तंत्र तय करता है। ज़मीन पर कार्य कार्यकर्ता करते हैं पर चुनावी टिकट आलाकमान तय करता है।

तंत्र से जुड़े लोगों द्वारा आपसी मिली भगत से आज देश में जो लूट मची है ऐसी लूटपाट करने वाले अंग्रेंजों से तो हमने 1947 में मुक्ति पा ली थी पर पिछले दो दशक में अमेरिकी तर्ज़ पर ढल चुके इस तंत्र में बैठे काले अंग्रेजों और अपने खुद के जयचंदों का हम क्या करें ? अब इस राजनीतिक तंत्र में जो व्यक्ति तंत्र का हिस्सा बनता है वह रातों रात करोड़पति बन जाता है। इसके बाद धन से राजनीतिक पद पा जाता है। जो लोक से जुड़ा रहता है उसके हिस्से में सिर्फ संघर्ष आता है। उसका कार्य होता है कि आलाकमान के कुकृत्यों को जनता के बीच वह सुकृत्य बनाकर प्रस्तुत करे। देश में इस समय एक वैचारिक आंदोलन की आवश्यकता है। सोनम वांगचुक के नेतृत्व में हुए आंदोलन से एक आस जागी है कि वैचारिक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन एक दशक पहले हुआ। उस राजनीतिक व्यवस्था से निकले अरविंद केजरीवाल ने लोगों के अंदर आंदोलन के प्रति विश्वास भी समाप्त कर दिया। सामान्य जनमानस अब इंस्टाग्राम एवं अन्य सोशल मीडिया पर आनंदित हो रहा है। सब कुछ समझते हुये भी उसके पास विकल्पहीनता है। यह विकल्पहीनता भी उसी राजनीतिक तंत्र का एक प्रारूप है। देश को इस समय राजनीतिक नहीं वैचारिक आंदोलन की आवश्यकता है। एक ऐसा आंदोलन जो भारत के लिए नया विमर्श तैयार कर सकें।

Editor-in-Chief Pioneer

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