तरुण विजय ।संपादक , नमस्ते शालोम
17 सितंबर 1950 को तत्कालीन बॉम्बे स्टेट के वडनगर में एक बच्चे का जन्म हुआ, जो आगे चलकर भारत का चौदहवां प्रधानमंत्री बना। उसी वर्ष, उसी तारीख को भारत सरकार ने इज़राइल को कानूनी मान्यता देने वाले दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। उस समय इज़राइल को अस्तित्व में आए केवल दो वर्ष हुए थे। नरेंद्र मोदी और भारत द्वारा इज़राइल को औपचारिक मान्यता दिए जाने का संबंध केवल एक वर्ष नहीं, बल्कि एक तारीख से भी है। छिहत्तर वर्ष बाद उसी तारीख को जन्मे प्रधानमंत्री ने भारत-इज़राइल संबंधों को अपने किसी भी पूर्ववर्ती से अधिक बदला है। उन्होंने केवल रिश्ते को मजबूत नहीं किया, बल्कि उसकी प्रकृति बदल दी। दशकों से इसे सीमित करने वाली एक शर्त हटाकर उन्होंने रक्षा, तकनीक, कृषि और साझा दृढ़ता पर आधारित आज की Special Strategic Partnership का मार्ग प्रशस्त किया।1950 से 2014 तक इज़राइल के साथ भारत के संबंधों को फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ जोड़कर देखा जाता था। इसके पीछे आत्मनिर्णय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता, गुटनिरपेक्ष आंदोलन में उसकी भूमिका और खाड़ी देशों में रह रहे करीब 80 लाख भारतीयों से जुड़ी कूटनीतिक वास्तविकताएं थीं। तेल अवीव की ओर बढ़ाए हर कदम के साथ रामल्लाह की ओर भी एक कदम अपेक्षित था।
पीएम मोदी ने फिलिस्तीन पर भारत की नीति छोड़े बिना इस स्थिति को बदला। भारत आज भी बातचीत से हासिल होने वाले दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है। लेकिन मोदी ने भारत-इज़राइल संबंधों को किसी अन्य वार्ता की प्रगति पर निर्भर रखने की व्यावहारिक शर्त हटा दी। उन्होंने इज़राइल को एक संप्रभु राष्ट्र और सभ्यतागत सहयोगी के रूप में, उसकी अपनी अहमियत के आधार पर देखना शुरू किया।इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत जुलाई 2017 में मिला, जब मोदी रामल्लाह की समानांतर यात्रा किए बिना इज़राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। हदेरा में वे प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ समुद्र तट पर नंगे पांव चले और भारत-इज़राइल को “natural partners” बताया। याद वाशेम में उन्होंने पुष्पांजलि अर्पित की और Bene Israel समुदाय से मुलाकात की। उन्होंने भारत में यहूदी समुदाय के दो हजार वर्षों के इतिहास और उत्पीड़न से मुक्त जीवन का उल्लेख किया। दोनों देशों ने कृषि, जल तकनीक और अंतरिक्ष में समझौते किए। यात्रा ने स्पष्ट कर दिया कि पुरानी conditionality समाप्त हो चुकी है।
De-hyphenation के आलोचकों का तर्क था कि इससे खाड़ी देशों में भारत की स्थिति कमजोर होगी, लेकिन हुआ उलटा। 2020 के Abraham Accords ने इज़राइल और UAE, बहरीन, सूडान तथा मोरक्को के संबंध सामान्य किए। भारत, इज़राइल, UAE और अमेरिका को जोड़ने वाला I2U2 इसी बदलाव का संस्थागत रूप है।सितंबर 2023 में नई दिल्ली में G20 के दौरान घोषित India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) इसे और आगे ले गया। यह भारत को सऊदी अरब और UAE के रास्ते यूरोप से जोड़ता है, जिसमें इज़राइल महत्वपूर्ण कड़ी है। पुराने hyphenated दृष्टिकोण में IMEC की कल्पना कठिन थी।7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा दक्षिणी इज़राइल में नागरिकों पर हमले और 1,200 से अधिक लोगों की हत्या के बाद पीएम मोदी ने तत्काल और बिना किसी शर्त हमलों की निंदा की। अप्रैल 2025 में पहलगाम में पर्यटकों को उनका धर्म पूछकर गोली मारे जाने पर इज़राइल ने भी तुरंत हमले की निंदा की।
मई 2025 में भारत ने Operation Sindoor के जरिए जवाब दिया, जिसमें इज़राइल निर्मित Harop loitering munitions और Spice-250 glide bomb kits का इस्तेमाल किया गया। आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में इज़राइल के समर्थन के लिए मोदी ने औपचारिक रूप से नेतन्याहू को धन्यवाद दिया। साझेदारी वास्तविक परिस्थितियों की कसौटी पर भी कायम रही।फरवरी 2026 के Jerusalem Summit में द्विपक्षीय संबंधों को Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity का दर्जा दिया गया। इसमें रक्षा, व्यापार, अंतरिक्ष, ऊर्जा, cybersecurity, कृषि और वैज्ञानिक अनुसंधान शामिल हैं। सक्रिय इज़राइल-ईरान संघर्ष के बीच मोदी ने इस साझेदारी को नई ऊंचाई दी, साथ ही खाड़ी देशों के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं और Gaza Peace प्रयासों के समर्थन को बनाए रखा। दोनों नेताओं ने IMEC और I2U2 पर करीबी सहयोग का संकल्प लिया। यही व्यवहार में भारत की strategic autonomy है।
मोदी द्वारा किया गया de-hyphenation आसान नहीं था। इसके लिए फिलिस्तीनी राष्ट्र के प्रति भारत के समर्थन को इज़राइल के साथ मजबूत साझेदारी के साथ बनाए रखना और यह दिखाना जरूरी था कि दोनों नीतियां परस्पर विरोधी नहीं हैं। इसके लिए भारतीय राष्ट्रीय हितों को स्पष्ट रूप से देखने और एक रिश्ते को दूसरे का बंधक न बनने देने का अनुशासन चाहिए। पिछले बारह वर्षों से मोदी ने दोनों को साथ लेकर चलकर दिखाया है।बारह वर्षों में बनाई गई यह साझेदारी किसी एक सरकार, संघर्ष या अंतरराष्ट्रीय जनमत के दौर से आगे टिकने की क्षमता रखती है। भारत द्वारा इज़राइल को मान्यता देने की तारीख और पीएम मोदी की जन्मतिथि का एक होना अब केवल संयोग नहीं, बल्कि उनकी सरकार की विदेश नीति की विरासत से जुड़ी एक उल्लेखनीय तारीख बन सकती है।
