सत्यम प्रताप सिंह निर्देशित नाटक 'आखिरी तमाशा' ने बांधा समां

लखनऊ। सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था एस०एस०एस० फाउन्डेशन के तत्वाधान में विश्वेश्वरैया हॉल, लखनऊ में सुप्रसिद्ध नाट्य रचनाकार सत्यम प्रकाश सिंह की नाट्यकृति "आखिरी तमाशा'' का मंचन नगर के प्रतिष्ठित नाट्य निर्देशक सत्यम प्रताप सिंह के कुशल निर्देशन में मंचित किया गया। मंचन से पूर्व मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्वलित कर प्रश्नगत कलाकारों को आर्शीवाद प्रदान किया गया।
नाट्यकृति ‘आखिरी तमाशा' में एक ऐसे कलाकार के इर्द- गिर्द घूमती है जो तमाशे की रंगीन दुनिया में अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद करते हुए धीरे - धीरे अपने ही विचारों, रिश्तों और हकीकत से टकराता है, मंच पर दिखने वाली चकाचौंध के पीछे एक कलाकार के संघर्ष और उसकी बेचैनी को बड़ी ही मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। नाट्यकृति 'आखिरी तमाशा' रंग दर्शकों को केवल एक कहानी देखने का अनुभव नहीं देगा, बल्कि उन्हें उस सवाल के सामने खड़ा करेगा कि जब एक कलाकार के भीतर के विचार और सपने हकीकत में आपस में टकराते हैं तो आखिर बचता ही क्या है कलाकार स्वयं एक "आखिरी तमाशा' बनकर रहा जाता है। यह नाट्यकृति सत्यम प्रताप सिंह द्वारा लिखित एवं निर्देशित किया गया है।
नाट्क के मुख्य पात्र में नाट्य निर्देशक सत्यम प्रकाश सिंह रघू की भूमिका में, झिलमिल की भूमिका में आयूषी गुप्ता, तवायफ की भूमिका में ज़ारा हयात, मिर्जागालिब की भूमिका में अरूण कुमार विश्वकर्मा, साया की भूमिका में जय ठाकुर, दादू की भूमिका में संजय शर्मा कव्वाल की भूमिका में हर्ष शुक्ला तथा श्रेयाश यादव ने अपने सशक्त और भावपूर्ण अभिनय से रंग दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
नाटक "आखिरी तमाशा' में प्रकाश परिकल्पना नगर के सुप्रसिद्ध प्रकाश परिकल्पनाकार मोहम्मद हफ़ीज़, उ0प्र0 संगीत नाटक अकादमी अवार्डी, संगीत संचालन अंकित श्रीवास्तव का था। सेट निर्माण आशुतोष विश्वकर्मा का था। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है, कि नाटक "आखिरी तमाशा" ने रंग दर्शकों को अत्यधिक प्रभावित किया ।



