हरियाणा में बिजली पर चल रही बहस में से एक आवाज़ गायब है और वह ग्राहक की आवाज़

नई दिल्ली। पैरेलल लाइसेंसिंग (समानांतर लाइसेंसिंग) को लेकर हो रही बहस अब बिजली कंपनियों के बीच की लड़ाई बन गई है। असल में यह सवाल इस बारे में होना चाहिए कि आम लोगों, किसानों और फ़ैक्टरियों को क्या मिलना चाहिए। हरियाणा में इस बात पर बहस चल रही है कि बिजली का वितरण कौन करेगा, और इस बहस में उन लोगों की राय पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा जो असल में बिजली का इस्तेमाल करते हैं। बिजली कंपनियां, यूनियन, अधिकारी और टिप्पणीकार – सभी अपने विचार सामने रख रहे हैं। लेकिन जिस पक्ष के हितों की रक्षा के लिए यह कानून बना है – यानी ग्राहक- उनकी पूरी तरह से अनदेखी हो रही है।

 

संभवतया यह तरीका ही गलत है। देवेन्द्र सिंह द्वारा एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी 1987 बैच, हरियाणा कैडर और हरियाणा के मुख्यमंत्री के पूर्व सलाहकार हैं। श्री सिंह ने हरियाणा में सरकार के स्वामित्व वाली दोनों बिजली वितरण कंपनियों का नेतृत्व किया है और वे भारत सरकार के बिजली मंत्रालय में संयुक्त सचिव भी रहे हैं। वे लिखते है कि मैं ऐसे ही एक कानूनी मुद्दे के साथ शुरुआत करना चाहूंगा जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती है। ग्राहक के पास बिजली डिस्ट्रीब्यूटर चुनने का विकल्प हो सकता है, यह कोई नई बात नहीं है। संसद ने 2003 के विद्युत अधिनियम में इस पहलु को शामिल किया था। इस अधिनियम की धारा 14 साफ तौर पर रेगुलेटर को एक ही आपूर्ति क्षेत्र में एक से अधिक डिस्ट्रीब्यूटर्स को लाइसेंस देने की इजाज़त देती है। इस तरीके को मुंबई में आज़माने बाद कानून में शामिल किया गया। हरियाणा इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के समक्ष पेश की गई याचिका के द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने की मांग की गई है। आप चाहे किसी एक आवेदक के बारे में कुछ भी सोचंे, लेकिन यह सिद्धांत कोई दखलंदाज़ी नहीं है, हमारा कानून पहले से यह अधिकार देता है।

एक आम परिवार के लिए यह अधिकार क्यों ज़रूरी है?

राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति अब तक तय नहीं है, जबकि ऐसा होना बेहद ज़रूरी है। हरियाणा के नूह जैसे ज़िले जो खेेती पर बहुत अधिक निर्भर हैं, वहां घंटों बिजली गुल रहना कोई नई बात नहीं है; बिजली जाने पर किसान का पंप बंद रहता है, छात्र पढ़ाई नहीं कर पाते। इसी मई में गुरुग्राम के एक सब-स्टेशन में आग लगने से शहर के कुछ हिस्सों की बिजली चली गई और गर्मी के पीक सीज़न में रैपिड मेट्रो सेवाएँ भी रुक गईं। 22 मई को, हरियाणा में देश के किसी भी राज्य के मुक़ाबले बिजली की सबसे अधिक कमी दर्ज की गई। ऐसे में कोई निवासी, दुकानदार या प्लांट मैनेजर बिजली की आपूर्ति को लेकर आश्वस्त नहीं है।

इस जोखिम की एक कीमत है, और ग्राहक पहले से ही इसे चुका रहे हैं।

गुरुग्राम की हाउसिंग सोसायटियों, कमर्शियल टावरों और इंडस्ट्रियल एस्टेट्स में, भरोसेमंद आपूर्ति न होने की समस्या का समाधान कर रहे हैं- डीज़ल जनरेटर। ग्रिड से मिलने वाली बिजली की कीमत लगभग 8 रुपये प्रति यूनिट है; जबकि बिजली जाने पर डीज़ल से चलने वाली बिजली की कीमत 20 रुपये या अधिक हो सकती है। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन इस बोझ को मासिक शुल्क के रूप में ग्राहक पर डाल देते हैं। वहीं उद्योग इसे प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के जुर्माने के रूप में चुकाते हैं। दूसरी ओर जनरेटर चलने से शहर में शोर और पार्टिकुलेट प्रदूषण बढ़ता है, वो भी तब जबकि शहर की हवा पहले से खराब गुणवत्ता की है। तो शहर में रोशनी बनाए रखने के लिए डीलर की पैरेलल इकोनॉमी चल रही है, जो भरोसेमंद आपूर्ति की समस्या को हल करने के बजाए सिस्टम की नाक़ामी को भारी-भरकम खर्च के रूप में सामने ला रही है। गुरुग्राम की हाउसिंग सोसाइटी, कमर्शियल टावर और इंडस्ट्रियल एस्टेट में, भरोसेमंद सप्लाई न होने का जवाब डीज़ल जनरेटर रहा है।

यहीं पर बात आती है अपनी पसंद का विकल्प चुनने की आज़ादी और साफ़-सुथरी बिजली की ज़रूरतों का पूरा होना। आज के ग्राहक को सिर्फ़ ज़्यादा नहीं बल्कि बेहतर बिजली चाहिए, ऐसी बिजली जो भरोसेमंद हो, जिसका बिल स्पष्ट हो, जहां डिजिटल सर्विस मिले और हो सके तो यह बिजली नवीकरणीय स्रोत से आए। श्इलेवन पावर ने गुरुग्राम, मानेसर, सोहना और नूह के लिए एक पैरेलल नेटवर्क में लगभग रु 4,700 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव दिया है। कंपनी अपनी 80 फीसदी आपूर्ति नवीकरणीय स्रोत से प्राप्त करेगी। और शहर में वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे डीज़ल जनरेटर की जगह बिना रुकावट बिजली देगी। साथ ही कंपनी ने आधुनिक और अंडरग्राउंड नेटवर्क का भी प्रस्ताव दिया है। इसके शुल्क प्रतिस्पर्धी होंगे और डीज़ल बैकअप की छिपी लागत को कम करने में भी योगदान देंगे। इस तरह ग्राहकों की मांग पूरी हो सकेगी। साथ ही उन एम्प्लॉयर्स की ज़रूरतें भी पूरी होंगी जिनके लिए स्वच्छ एवं सत्यापित की जा सकने वाली पावर उपलब्ध कराना अब ज़रूरी हो गया है।

 

गुणवत्ता की बात करें तो आज ग्राहकों को SAIDI और SAIFI जैसे पैमानों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं होती है। एक आधुनिक डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटी को न सिर्फ़ इन पैमानों में सुधार करना चाहिए, बल्कि उन्हें पारदर्शी तरीके से प्रकाशित भी करना चाहिए, ताकि ग्राहक इस बात पर निगरानी रख सकें कि बिजली कितनी बार जाती है और कितनी जल्दी वापस आती है। यहां विकल्प का अर्थ उस तरीके से है, जहां ग्राहक गुणवत्ता के लिए रिक्वेस्ट कर सके और जवाब की उम्मीद रख सके। और असल मुद्दा यही है कि ग्राहक के पास ऐसा विकल्प है ही नहीं। यह एक गंभीर मुद्दा है, जिसे जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए। इस मामले में, जवाब खुद लाइसेंस वाले इलाके में ही छिपा हैः नूह गुरुग्राम के साथ-साथ इसी इलाके में आता है। अगर कोई प्रस्ताव कम मुनाफ़े वाले कृषि ज़िले से शुरू होता है, न कि सिर्फ़ कमर्शियल ज़िले से, तो इसे “चैरी-पिकिंग” (सिर्फ़ फ़ायदे वाली चीज़ें चुनना) नहीं कहा जा सकता, जैसा कि इसके आलोचकों को डर है। उसी अधिनियम की धारा 43 – यानि युनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन- किसी भी लाइसेंसधारी को हर तरह के ग्राहक को सेवा देने के लिए बाध्य करती है। इसे अच्छी नीयत पर नहीं छोड़ा जा सकता, यह एक कानूनी ज़िम्मेदारी है।
गरीब और कमज़ोर वर्ग के ग्राहकों के लिए सब्सिडी को लेकर चिंताएँ उचित हैं, लेकिन पैरेलल लाइसेंसिंग से उनके प्रति राज्य की ज़िम्मेदारी में कोई अंतर नहीं आएगा। विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 65 के तहत, जब सरकार किसी ग्राहक या ग्राहकों के किसी वर्ग को सब्सिडी देती है, तो उसे प्रभावित लाइसेंसधारी को राज्य आयोग के निर्देशानुसार पहले से ही मुआवज़ा देना होता है।

यह साफ़ करना ज़रूरी हैः किसी तय इलाके में एक और लाइसेंसधारी को शामिल करना राज्य की बिजली व्यवस्था का “निजीकरण” नहीं है, और न ही इससे मौजूदा लाइसेंसधारी हटता है, वह पूरे हरियाणा में ग्राहकों को सेवा देना जारी रखता है।

कानून में जोड़ने और चुनने की बात कही गई है, बदलने की नहीं।

कमीशन ने इस मामले की सुनवाई सार्वजनिक रूप से करने का फैसला किया है। यह सही सोच है, क्योंकि असल में यह सवाल भी सार्वजनिक ही है। क्योंकि सवाल एक ही हैः क्या नूह के निवासियों, किसान, गुरुग्राम के परिवारों और फैक्ट्रियों को ज़्यादा भरोसेमंद, साफ, उचित कीमत वाली बिजली मिलेगी, यह बिजली उनहें कौन देगा? जब ग्राहक को इस पर बात करने, आवाज़ उठाने का मौका मिलता है, तो सब कुछ खुद-बखुद ही ठीक हो सकता है।

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