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गुरुग्राम

डिस्चार्ज के 48 घंटे में नई चुनौती: ग्रासियास लिविंग दे रहा है मरीजों को सुरक्षित रिकवरी स्पेस

गुरुग्राम : इस तरह की बातचीत अस्पताल के परिसर में अक्सर होती है। डॉक्टर, जब इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि मरीज की हालत स्थिर है, तो वे परिवार को बताते हैं कि मरीज को अगली सुबह छुट्टी दे दी…

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डिस्चार्ज के 48 घंटे में नई चुनौती: ग्रासियास लिविंग दे रहा है मरीजों को सुरक्षित रिकवरी स्पेस

गुरुग्राम : इस तरह की बातचीत अस्पताल के परिसर में अक्सर होती है। डॉक्टर, जब इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि मरीज की हालत स्थिर है, तो वे परिवार को बताते हैं कि मरीज को अगली सुबह छुट्टी दे दी जाएगी। परिवार वाले सिर हिलाकर सहमति जताते हैं, लेकिन असली समस्या लिफ्ट में ही पता चल जाती है, वे घर पहुंचकर सीढ़ियां भी नहीं चढ़ सकते, अकेले बाथरूम का इस्तेमाल नहीं कर सकते, परिवार में काम से कोई भी सदस्य तीन सप्ताह की छुट्टी नहीं ले सकता और फ्लैट में ग्राउंड फ्लोर पर कोई कमरा भी नहीं होता है।

भारत में अस्पताल मरीज की मेडिकल स्थिति के आधार पर उन्हें छुट्टी देते हैं। मरीज को घर ले जाने की तैयारी है या नहीं, यह कोई अस्पताल ध्यान नहीं देता और शायद ही कोई इस बारे में खयाल रखता है।
गुरुग्राम में दो रेजिडेंस चलाने वाली सीनियर केयर संस्था ग्रासियास लिविंग का कहना है कि हर महीने ऐसे दो-तीन मामले आते हैं, जिनमें परिवारों ने अस्पताल से छुट्टी से एक सप्ताह पहले तक कोई तैयारी नहीं की होती है और उन्हें छुट्टी दे दी जाती है।

ग्रासियास लिविंग के संस्थापक डॉ. विशाल सिवाच कहते हैं, ‘जब तक डिस्चार्ज की तारीख तय होती है, तब तक मेडिकल फैसला लिया जा चुका होता है और आम तौर पर वह सही फैसला ही होता है। इसके बाद लॉजिस्टिक्स की समस्या सामने आती है, जिसका बोझ परिवार पर अचानक पड़ता है। लोग हॉस्पिटल में बेड, नर्स, फिजियोथेरेपी और रात में जागने वाले किसी व्यक्ति का इंतजाम करने की कोशिश करते हैं और वे यह सब एक ही दिन में करने को मजबूर होते हैं।’
मरीजों को मिलता हैे संक्षिप्त समय ग्रासियास लिविंग का कहना है कि ऐसी स्थिति में परिवार आमतौर पर डिस्चार्ज से एक या दो दिन पहले उनके रेजिडेंस का दौरा करते हैं, एडमिशन से जुड़ी कागजी प्रक्रिया पूरी करते हैं, जरूरी उपकरणों पर सहमति बनाते हैं और खर्च की पुष्टि करते हैं। पेमेंट हो जाने के बाद, व्यक्ति 12 से 24 घंटे के भीतर यहां आकर रह सकता है।

छोटेे रिकवरी स्टे के लिए रोजाना या साप्ताहिक आधार पर शुल्क लिया जाता है, यानी परिवारों को पूरे एक महीने के लिए प्रतिबद्ध होने की जरूरत नहीं होती। संस्था का कहना है कि यह उन परिवारों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जिन्हें अभी यह पता नहीं है कि रहने की अवधि दस दिनों की होगी या तीन महीने की। अस्पताल से छुट्टी के बाद फिजियोथेरेपी सहित रिकवरी केयर की फीस 1,50,000 रुपये प्रति माह है। फिजियोथेरेपी के बिना, लेकिन एक समर्पित अटेंडेंट के साथ रिकवरी केयर की फीस 1,30,500 रुपये प्रति माह है।

अस्पताल से छुट्टी के बाद ठहरने के लिए दैनिक शुल्क 5,000 रुपये प्रति दिन से शुरू होता है। संस्था केवल पूछताछ करने पर कीमत बताने के बजाय अपनी फीस सार्वजनिक रूप से जारी करती है। यह अस्पताल नहीं, बल्कि एक आवासीय सुविधा है ग्रासयास लिविंग स्पष्ट करता है कि यह एक ’आवासीय देखभाल सुविधा’ है। यहां नर्सिंग स्टाफ चौबीसों घंटे मौजूद रहता है और डॉक्टर नियमित रूप से विजिट करते हैं। हालांकि, यदि किसी ऐसी चिकित्सकीय प्रक्रिया या उपचार की आवश्यकता पड़ती है जो इस सेंटर के दायरे से बाहर है, तो डॉक्टर को बुलाया जाता है या निवासी को पास केे किसी स्वास्थ्य केंद्र में स्थानांतरित कर दिया जाता है। डॉ. सिवाच ने कहा, ‘परिवार कभी-कभी यह मान लेते हैं कि यह अस्पताल की देखभाल से एक स्तर नीचे की सुविधा है और उन्हें चिंता होती है कि वे अपने प्रियजन के इलाज में कुछ कम कर रहे हैं। जबकि वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह पूरी तरह अलग तरह की देखभाल है। अस्पताल का काम उन्हें स्थिर स्थिति में लाना है। इसके बाद के कई हफ्ते उन्हें फिर से चलने, ठीक से खाने और रातभर अच्छी नींद लेने में मदद करने के लिए होते हैं और इसके लिए अस्पताल का वार्ड उचित जगह नहीं होता है।’

विदेश में रहने वाले परिवारों के लिए
काफी पूछताछ भारत के बाहर रहने वाले बच्चों से जुड़ी होती है, जिनके लिए माता-पिता का डिस्चार्ज दूरी और टाइम जोन की वजह से मुश्किल होता है। ऐसे मामलों में एडमिशन अक्सर दूर से ही अरेंज किया जाता है, जिसमें कोई रिश्तेदार या फैमिली फ्रेंड खुद विजिट पर आ जाता है।