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‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘कैकेयी के राम’ पर संवाद

पांचवां गोमती पुस्तक महोत्सव प्रश्नों का रहीस सिंह ने सरल, सहज और आत्मीय भाषा में दिया उत्तर पायनियर समाचार सेवा लखनऊ। पांचवें गोमती पुस्तक महोत्सव के अंतर्गत ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में लेखक रहीस सिंह और डॉ. ललित किशोर मंडोरा के बीच…

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‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘कैकेयी के राम’ पर संवाद

पांचवां गोमती पुस्तक महोत्सव

  • प्रश्नों का रहीस सिंह ने सरल, सहज और आत्मीय भाषा में दिया उत्तर

पायनियर समाचार सेवा

लखनऊ। पांचवें गोमती पुस्तक महोत्सव के अंतर्गत ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में लेखक रहीस सिंह और डॉ. ललित किशोर मंडोरा के बीच उनकी चर्चित पुस्तक ‘कैकेयी के राम’ को लेकर सार्थक एवं रोचक संवाद हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की परंपरा के अनुसार हुई। इस अवसर पर डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी, सहायक संपादक, ने  रहीस सिंह का शॉल ओढ़ाकर एवं पुस्तकें भेंटकर स्वागत किया।

संवाद के दौरान डॉ. ललित किशोर मंडोरा ने ‘कैकेयी के राम’ पुस्तक के संदर्भ में विभिन्न प्रश्न किए, जिनका रहीस सिंह ने सरल, सहज और आत्मीय भाषा में उत्तर दिया। उन्होंने पुस्तक की रचना की पृष्ठभूमि साझा करते हुए कहा कि लगभग तीन वर्ष पूर्व जब वे श्रीरामचरितमानस का अध्ययन कर रहे थे, तब उन्हें भगवान राम के जीवन और उनके चरित्र से जुड़े अनेक ऐसे तथ्य मिले, जिन्होंने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि हम राम को पढ़ते और पूजते तो हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम उनके जीवन-मूल्यों को अपने जीवन में कितना उतार पाते हैं।  सिंह ने कहा कि श्रीराम का जीवन मर्यादा, करुणा और मानवीय संवेदना का प्रतीक है। वे केवल राजमहल तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शबरी, केवट, अहिल्या, हनुमान और जटायु जैसे पात्रों तक स्वयं पहुंचते हैं और उन्हें सम्मान देते हैं। उनके अनुसार राम का यही स्वरूप उन्हें लोकनायक और जन-जन के आराध्य के रूप में स्थापित करता है।

माता कैकेयी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भगवान राम ने उन्हें ‘महतारी’ कहकर संबोधित किया। कैकेयी को लेकर समाज में लंबे समय से एक नकारात्मक धारणा रही है, जबकि राम स्वयं उनके पास जाकर कहते हैं कि उनका कोई दोष नहीं है। सिंह ने कहा कि स्त्री अपनी पीड़ा को व्यक्त करने का साहस रखती है, लेकिन कई बार परिस्थितियों के कारण उसे व्यक्त नहीं कर पाती। उन्होंने कैकेयी के चरित्र को इसी मानवीय संवेदना और पीड़ा के संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने बताया कि ‘कैकेयी के राम’ के अब तक छह संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।  सिंह ने कहा कि वे स्वयं को साहित्य का विशेषज्ञ नहीं मानते, बल्कि संस्कृत से जुड़े विद्यार्थी के रूप में अपनी पहचान बताते हैं। उनके अनुसार यह पुस्तक लिख पाना ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद का परिणाम है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान की प्रेरणा से श्रीरामचरितमानस की रचना की, उसी प्रकार उन्हें भी अपनी पुस्तक लिखने में माता सरस्वती की कृपा का अनुभव हुआ।

रहीस सिंह ने भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के स्वरूप की एकात्मकता पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि उनके लिए धनुषधारी राम और वंशीधारी कृष्ण एक ही दिव्य चेतना के दो रूप हैं। कैकेयी के वनवास प्रसंग पर उन्होंने बताया कि वशिष्ठ के कथन के अनुसार कैकेयी को एक विशेष भूमिका के लिए चुना गया था। राम के वनगमन को उन्होंने केवल एक घटना नहीं, बल्कि व्यापक लोकहित और मानव-कल्याण की यात्रा के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि वनवास के दौरान राम से मिलने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनकी यात्रा का सहभागी बनता गया।  सिंह ने कहा कि राम के जीवन में क्रोध व्यक्तिगत प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के हित की रक्षा का साधन था। उन्होंने केवट, शबरी और वनवासी समुदायों के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि राम का जीवन हमें समानता, संवेदना, सम्मान और सेवा का संदेश देता है।

उन्होंने बताया कि पुस्तक लिखने के लिए उन्होंने वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का गहन अध्ययन किया तथा विषय की गंभीरता को देखते हुए आचार्यों से विमर्श भी किया। उन्होंने कहा कि भगवान राम के चरित्र पर लिखते समय उनके मन में यह संकोच था कि वे इस विषय के साथ न्याय कर पाएंगे या नहीं, लेकिन निरंतर अध्ययन, संवाद और ईश्वर की कृपा से यह पुस्तक आकार ले सकी। संवाद सत्र ने श्रोताओं को ‘कैकेयी के राम’ के माध्यम से रामकथा के एक अलग और मानवीय पक्ष को समझने का अवसर प्रदान किया।