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कुमाऊंनी रामलीला की तालीम, 166 वर्ष पुरानी यह विरासत

पायनियर समाचार सेवा। अल्मोड़ा। अल्मोड़ा में ये सिर्फ रामलीला की तालीम नहीं ये 166 साल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस लेती एक सांझा सांस्कृतिक विरासत है, जिसमें रामकथा के साथ शास्त्रीय संगीत और लोक परंपराएं सदियों से जीवंत हैं। देवभूमि की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा…

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कुमाऊंनी रामलीला की तालीम, 166 वर्ष पुरानी यह विरासत

पायनियर समाचार सेवा। अल्मोड़ा। अल्मोड़ा में ये सिर्फ रामलीला की तालीम नहीं ये 166 साल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस लेती एक सांझा सांस्कृतिक विरासत है, जिसमें रामकथा के साथ शास्त्रीय संगीत और लोक परंपराएं सदियों से जीवंत हैं। देवभूमि की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा इसी गंगा-जमुनी तहजीब की विरासत को मंच तक पहुंचाने पहुंचाने में जुट गयी है। यहां कुमाऊंनी रामलीला के ‘प्रशिक्षण’ शुरूआत हो चुकी है जिससे तालिम कहा जाता है। यहां सुर, संवाद और अभिनय के इस कठिन रियाज में कालाकार तैंयार हो रहे हैं।


कुमाऊंनी रामलीला की शुरूआत साल 1860 में अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर के आंगन से हुई। 166 साल बाद भी इसकी परंपरा उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रही है। कुमाऊंनी रामलीला की खासियत इसका शास्त्रीय संगीत पर आधारित गायन, रामलीला के पात्र विहाग, जोगिया, पीलू, भैरवी, खमाज, सोहनी, देश और मालकौंस जैसे रागों में गीत गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं। वर्तमान में अल्मोड़ा के नगरीय क्षेत्र में 9 नौ स्थानों में रामलीला खेली जाती है। तीन महीने की कठिन तालिम के बाद जब कलाकार मंच पर उतरते हैं, तो गायन की अनूठी शैली और अभिनय का संगम पूरे माहौल को राममय कर देता है। यहां कोशिश की जाती है की सभी लोगों को मंच पर अभिनय और गायन का मौका मिले इस लिए साल दर साल कलाकार बदले भी जाते हैं। खास बात ये है कि कुमाऊंनी रामलीला के मंचन में समाज के हर वर्ग और सभी धर्मों के लोग भाग लेते हैं। नगर निगम के पार्षद भी मंच पर अभिनय के साथ अपनी गायन प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं।