बीमा वितरण व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी, एजेंटों ने उठाए रोजगार और बीमा पहुंच से जुड़े सवाल

नई दिल्ली। देश में बीमा बेचने और पॉलिसीधारकों को सेवाएं देने की मौजूदा व्यवस्था में आने वाले समय में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। *भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI)* ने बीमा वितरण की लागत, कमीशन, मिस-सेलिंग और पॉलिसीधारकों के हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण बदलावों पर सार्वजनिक परामर्श शुरू किया है।
प्रस्तावों का उद्देश्य बीमा की लागत को नियंत्रित करना, वितरण व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाना और ग्राहकों को बेहतर मूल्य उपलब्ध कराना है। हालांकि बीमा एजेंटों और अन्य वितरण से जुड़े वर्गों का कहना है कि लागत कम करने के साथ यह भी देखना जरूरी है कि इसका असर देश में बीमा की पहुंच और पॉलिसीधारकों को मिलने वाली सेवाओं पर न पड़े।
बीमा क्षेत्र में एजेंट और अन्य मध्यस्थ लंबे समय से ग्राहकों और बीमा कंपनियों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। विशेषकर छोटे शहरों और कस्बों में पॉलिसी खरीदने से लेकर उसके नवीनीकरण और क्लेम के समय तक बड़ी संख्या में ग्राहक व्यक्तिगत सहायता पर निर्भर रहते हैं।
*Insurance Agents Welfare Association (IAWA) के अध्यक्ष नवीन गोयल* का कहना है, “बीमा की लागत कम करना और गलत बिक्री पर रोक लगाना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन बीमा वितरण को केवल कमीशन की लागत के रूप में देखना सही नहीं होगा। एजेंट की जिम्मेदारी पॉलिसी बेचने के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि वह वर्षों तक ग्राहक को नवीनीकरण, पॉलिसी सर्विसिंग और क्लेम के समय सहायता देता है।”
परामर्श पत्र में अलग-अलग बीमा उत्पादों और वितरण माध्यमों के लिए कमीशन व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव किया गया है। स्वास्थ्य बीमा जैसे क्षेत्रों में पहली बार ली जाने वाली पॉलिसी और उसके नवीनीकरण के लिए अलग-अलग कमीशन सीमा प्रस्तावित की गई है। *IAWA* का मानना है कि किसी भी बदलाव से पहले यह समझना जरूरी है कि उसका असर एजेंटों की दीर्घकालिक आर्थिक व्यवहार्यता और ग्राहकों को मिलने वाली सेवाओं पर क्या होगा।
*नवीन गोयल* के अनुसार, “अगर किसी विशेष चैनल या संस्था में अत्यधिक भुगतान अथवा गलत बिक्री के प्रमाण हैं, तो वहां निश्चित रूप से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन समस्या जहां है, समाधान भी वहीं केंद्रित होना चाहिए। पूरे वितरण तंत्र को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा।”
*एसोसिएशन* ने बीमा की पहुंच के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बताया है। उसका कहना है कि डिजिटल माध्यम तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन भारत में बीमा अभी भी बड़े पैमाने पर ऐसा वित्तीय उत्पाद है जिसे समझने और खरीदने के लिए ग्राहकों को सहायता की जरूरत पड़ती है।
*गोयल* ने कहा, “भारत को ज्यादा बीमा चाहिए और ज्यादा परिवारों तक बीमा पहुंचाना है। ऐसे में हमें लागत और वितरण, दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा। बीमा सस्ता होना चाहिए, लेकिन बीमा को लोगों तक पहुंचाने वाली व्यवस्था कमजोर नहीं होनी चाहिए।”
IAWA के सक्रिय सदस्य और बीमा क्षेत्र से जुड़े राम गोपाल कोठारी ने कहा, “कमीशन एजेंट का मुनाफा नहीं, बल्कि उसका राजस्व है, जिससे कार्यालय, कर्मचारियों, तकनीक और सालभर की ग्राहक व क्लेम सेवाओं का खर्च चलता है। इसमें बड़ी कटौती का असर केवल एजेंट की आय पर नहीं, बल्कि रोजगार और पॉलिसीधारकों को मिलने वाली जमीनी सेवाओं पर भी पड़ सकता है।”
*IAWA* का कहना है कि वह पारदर्शिता बढ़ाने, मिस-सेलिंग रोकने और अनुचित भुगतान पर नियंत्रण जैसे सुधारों का समर्थन करता है। साथ ही एसोसिएशन ने मांग की है कि अंतिम नियम तय करने से पहले एजेंटों, छोटे वितरण माध्यमों और पॉलिसीधारकों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव का भी आकलन किया जाए।
“अंततः सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पॉलिसी कितनी सस्ती होगी। सवाल यह भी है कि उसे देश के अंतिम व्यक्ति तक कौन पहुंचाएगा और क्लेम के समय उसकी सहायता कौन करेगा,” *गोयल* ने कहा।



