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उत्तराखंड में विधायक निधि खर्च की रफ्तार पहाड़ में धीमी, मैदान में तेज

जून 2026 तक 1,664 करोड़ में 1,091 करोड़ रुपये खर्च पहाड़ी विधायकों का औसत खर्च 14.74 करोड़, मैदानी क्षेत्रों में 16.88 करोड़ सोनू उनियाल देहरादून। उत्तराखंड में विधायक निधि के इस्तेमाल को लेकर सामने आए सरकारी आंकड़े प्रदेश में विकास निधि खर्च…

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उत्तराखंड में विधायक निधि खर्च की रफ्तार पहाड़ में धीमी, मैदान में तेज
  • जून 2026 तक 1,664 करोड़ में 1,091 करोड़ रुपये खर्च

  • पहाड़ी विधायकों का औसत खर्च 14.74 करोड़, मैदानी क्षेत्रों में 16.88 करोड़

सोनू उनियाल
देहरादून। उत्तराखंड में विधायक निधि के इस्तेमाल को लेकर सामने आए सरकारी आंकड़े प्रदेश में विकास निधि खर्च की अलग-अलग तस्वीर दिखाते हैं। वित्तीय वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक प्रदेश के विधायकों के लिए कुल 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध रही, जिसमें से 1,091.29 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस तरह करीब 66 प्रतिशत निधि का उपयोग हुआ, जबकि लगभग 572.71 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी रहे। ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों के मुताबिक विधायक निधि खर्च की रफ्तार पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में अलग-अलग रही। पहाड़ी जिलों के 34 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 807.5 करोड़ रुपये उपलब्ध रहे, जिनमें से 501.07 करोड़ रुपये खर्च हुए। यहां प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा और खर्च दर करीब 62 प्रतिशत रही। इसके मुकाबले हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर के 20 विधानसभा क्षेत्रों के लिए करीब 475 करोड़ रुपये उपलब्ध रहे। इनमें से लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च किए गए। मैदानी विधायकों का औसत खर्च करीब 16.88 करोड़ रुपये और खर्च दर करीब 71.1 प्रतिशत रही। यानी औसत खर्च के लिहाज से पहाड़ और मैदान के बीच करीब 2.14 करोड़ रुपये प्रति विधायक का अंतर सामने आया।

मिश्रित जिलों में खर्च दर 66.4 प्रतिशत

देहरादून और नैनीताल को अलग श्रेणी में रखने पर इन दोनों जिलों की 16 विधानसभा सीटों में करीब 380 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही और लगभग 252.36 करोड़ रुपये खर्च हुए। यहां प्रति विधायक औसत खर्च करीब 15.77 करोड़ रुपये और कुल खर्च दर 66.4 प्रतिशत रही। इस तरह भौगोलिक आधार पर देखें तो पहाड़ी जिलों में विधायक निधि खर्च की दर करीब 62 प्रतिशत, मिश्रित जिलों में 66.4 प्रतिशत और मैदानी जिलों में 71.1 प्रतिशत रही। हालांकि इन आंकड़ों से खर्च में अंतर के कारणों का स्वत: निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियां, कार्यस्थल तक पहुंच, प्रशासनिक प्रक्रिया और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कारक अलग हो सकते हैं।

विधायकवार प्रतिशत में कांग्रेस आगे

मौजूदा विधायक दल की संबद्धता के साथ खर्च प्रतिशत की तुलना करने पर भी अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों में कांग्रेस विधायकों के विधायकवार खर्च प्रतिशत का औसत करीब 68.4 प्रतिशत, जबकि भाजपा विधायकों का औसत करीब 64.4 प्रतिशत रहा। यानी विधायकवार दर्ज प्रतिशत के साधारण औसत में करीब चार प्रतिशत अंक का अंतर है। यह तुलना कुल निधि की भारित व्यय दर नहीं, बल्कि प्रत्येक विधायक के दर्ज खर्च प्रतिशत का साधारण औसत है। इसलिए इसे दोनों दलों की कुल निधि खर्च दर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

77 प्रतिशत खर्च के साथ दो विधायक शीर्ष स्तर पर

विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों में 77 प्रतिशत खर्च के स्तर पर रुड़की के भाजपा विधायक प्रदीप बत्रा और पिरान कलियर के कांग्रेस विधायक फुरकान अहमद दर्ज हैं। इसके बाद ज्वालापुर के रवि बहादुर और मंगलौर के काजी निजामुद्दीन का खर्च प्रतिशत 76 प्रतिशत दर्ज है। 75 प्रतिशत के स्तर पर सल्ट के महेश जीना और अन्य विधानसभा क्षेत्रों के विधायक शामिल हैं। वहीं कुछ क्षेत्रों में खर्च 60 प्रतिशत से नीचे भी है। विधायक निधि खर्च के आंकड़ों में सबसे कम प्रतिशत टिहरी विधानसभा क्षेत्र का करीब 30 प्रतिशत दर्ज है। इसके बाद यमकेश्वर में करीब 44 प्रतिशत, चकराता में 51 प्रतिशत, कपकोट में 52 प्रतिशत और चंपावत में 53 प्रतिशत खर्च दर्ज किया गया है। यानी एक ही अवधि में कुछ विधानसभा क्षेत्रों में निधि खर्च 70 प्रतिशत से अधिक रहा, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह 50 प्रतिशत या उससे नीचे रहा।

मंत्रियों में भी खर्च में बड़ा अंतर

कैबिनेट मंत्रियों की विधानसभा सीटों के आंकड़ों में भी अंतर दिखाई देता है। प्रदीप बत्रा की सीट पर 77 प्रतिशत, सौरभ बहुगुणा की सीट पर 72 प्रतिशत और मदन कौशिक की सीट पर 70 प्रतिशत खर्च दर्ज है। सतपाल महाराज की सीट पर 68 प्रतिशत, खजान दास पर 66 प्रतिशत, गणेश जोशी पर 65 प्रतिशत, राम सिंह कैड़ा पर 62 प्रतिशत और रेखा आर्या की सीट पर 60 प्रतिशत खर्च दर्ज किया गया। वहीं सुबोध उनियाल और भरत सिंह चौधरी की सीटों पर करीब 57 प्रतिशत, जबकि डॉ. धन सिंह रावत की सीट पर करीब 37 प्रतिशत खर्च दर्ज है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अंतिम दौर में है। ऐसे में विधायक निधि खर्च के ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि एक समान वित्तीय अवधि में सभी विधानसभा क्षेत्रों में उपलब्ध और खर्च की गई निधि की तस्वीर सामने आती है। जून 2026 तक करीब 573 करोड़ रुपये की निधि खर्च होना बाकी थी। आने वाले महीनों में इस राशि के उपयोग की रफ्तार में कितना बदलाव आता है, यह अलग से देखने वाली बात होगी।

‘निधि की मांग के साथ उसका उपयोग भी जरूरी’

वरिष्ठ पत्रकार नीरज कोहली ने विधायक निधि के उपयोग को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि वर्ष 2002 में राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के समय विधायक निधि 75 लाख रुपये थी, जो अब बढ़कर पांच करोड़ रुपये सालाना हो गई है। उनके मुताबिक विधायक सत्ता पक्ष में हों या विपक्ष में, क्षेत्र के विकास के लिए निधि बढ़ाने की मांग करते हैं, लेकिन उपलब्ध राशि का प्रभावी उपयोग भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों वाले उत्तराखंड में यदि विधायक निधि बढ़ाने की मांग की जाती है तो उसका पूरा और सही उपयोग सुनिश्चित करना भी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और विकास की जरूरत को देखते हुए विधायक निधि के प्रभावी इस्तेमाल को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। जून 2026 तक के आंकड़े कुल मिलाकर यह दिखाते हैं कि विधायक निधि खर्च में प्रदेशभर में एकरूपता नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में औसत खर्च और खर्च दर मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कम रही, जबकि मिश्रित जिलों की स्थिति दोनों के बीच रही। साथ ही विधानसभा क्षेत्रवार खर्च प्रतिशत में भी बड़ा अंतर सामने आया है।