पायनियर समाचार सेवा
नई दिल्ली। सुमेश नायर, सह-संस्थापक, बोर्ड इनफिनिटी ने कहा कि एआई का ट्यूटरिंग और शिक्षकों के काम में मदद करने में विशेष योगदान है। यह बड़े पैमाने पर ऐसी एजुकेशनल सपोर्ट देने में मदद करती है, जिसे कई बड़े संस्थान अपने संसाधनों के बल पर अकेले प्रदान करने में मुश्किल का सामना करते हैं।
शिक्षा में आर्टिफिशल इंटैलिजेंस को लेकर वर्षों से चल रही दो प्रकार की चर्चाएँ प्रचार और भय फैलाने का प्रयास कर रही हैं। एक ओर, यह दावा किया जाता है कि एआई के एल्गोरिदम पढ़ाई को बच्चों के अनुसार तैयार करने का प्रयास करेंगे, जिससे विश्वविद्यालय का काम करने का तरीका बदल जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यह चेतावनी दी जाती है कि मशीनें शिक्षा के मूल्यों और महत्व को नष्ट कर देंगी।
अधिकांश शिक्षकों ने इन दोनों ही दृष्टिकोणों को इतनी बार सुना है कि वे असमंजस की स्थिति में हैं।
काफी हद तक यह स्वाभाविक भी है। हांलाकि शिक्षा के क्षेत्र में एआई (AI) के इस्तेमाल को लेकर शुरुआती वादे काफी बढ़ा-चढ़ाकर किए गए थे। विश्वविद्यालयों को बताया गया था कि एआई (AI) नाम की यह नई तकनीक कक्षाओं को बदलने का काम करेगी। मगर कई जगहों पर इसे केवल नए डिजिटल टूल्स की श्रेणी में शामिल कर दिया गया, जो प्रतिक्रियाओं को संभालने तक ही सीमित है।
एआई(AI) के लिए बढ़ा चढ़ाकर चलाए गए प्रचार चक्र के नीचे कुछ चीजें धीरे धीरे भी बदल रही हैं । इसमें कोई दोराय नहीं कि उच्च शिक्षा के कुछ क्षेत्रों में, एआई (AI) टूल उपयोगी साबित हो रहा हैं – मगर बड़े पैमाने पर नहीं बल्कि कुछ जटिल समस्याओं के व्यावहारिक समाधान के रूप में इसे देखा जा सकता है। छात्रों को पढ़ाई में बनाए रखना इसका एक मुख्य उदाहरण है।
लंबे समय से विश्वविद्यालय इस बात को जान चुके हैं कि छात्र ड्रॉपआउट से पहले कई तरह के चेतावनी के संकेत देते हैं, जिससे उनकी समस्या समझ आने लगती है। देखा जाए, तो समस्या यह नहीं रही कि लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। अगर कोई समस्या रही है, तो वो यह है कि इसके निवारण के लिए समय पर कार्रवाई कैसे की जाए।
सुनने में शायद यह एक बहुत बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता है। मगर देखा जाए, तो इसका व्यवहारिक असर महत्वपूर्ण है। टूयटरिंग को लेकर कुछ ऐसे प्रमाण देखने को मिलते हैं, जिसमें पाया गया कि एआई (AI) शिक्षण को सपोर्ट करने का काम तो करता हैं, मगर किसी प्रोफेसर का स्थान नहीं ले सकता है। वहीं दूसरी ओर यह छात्रों को बहुत बड़े स्तर पर शैक्षणिक सहायता प्रदान करता है, जिसे कई संस्थानों के लिए अकेले उपलब्ध करवाना भी संभव नहीं है।
आपरेशनल वर्क में भी विश्वविद्यालयों को एआई (AI) की उपयोगी भूमिका नजर आ रही है। ऐसे शिक्षक जिन पर एडमिनिस्ट्रेटिव जिम्मेदारियों का बोझ बहुत ज्यादा है, उन्हें भविष्य के लिए किसी असिस्टेंट की नहीं, बल्कि ऐसे टूल्स की आवश्यकता है जो उनके द्वारा बार बार दोहराए जाने वाले कामों को आसान बना सकें। जैसे छात्रों के लिए फीडबैक तैयार करना, शेड्यूलिंग मैनेज करना और रोज़मर्रा के कार्यों को व्यवस्थित ढ़ग से करना। देखने में ये काम बेशक छोटे और आसान लगते हैं, लेकिन इनमें मदद मिलने से शिक्षकों का काफी समय बच सकता है।
इसमें प्रैक्टिकल संभावनाएं छिपी हुई नज़र आतीं हैं। इसका मकसद टीचिंग की जगह लेना नहीं, बल्कि पढ़ाने वालों को पढ़ाने के लिए ज्यादा समय देना है। बेशक, विश्वविद्यालयों को फायदा मिल रहा है, मगर उन मुश्किल सवालों का जवाब नहीं दे रही है, जिसका सामना अभी कैंपस कर रहे हैं यानि एकेडमिक ईमानदारी, यानि कोई इसका गलत फायदा तो नहीं उठा रहा। जेनरेटिव एआई की बात करें, तो उसने असेसमेंट के बारे में बनी पुरानी धारणाओं को जिस तेजी से चुनौती दी है, शायद यूनिवर्सिटीज उतनी तेजी से खुद को बदलने में समर्थ नहीं हैं। यह तनाव की स्थिति पैदा करता है। हांलाकि कई संस्थान अभी भी पुराने जमाने की पॉलिसीज के आधार पर ही काम कर रहे हैं, जो उस समय के अनुरूप तैयार की गई थीं।
वहीं, कुछ लोग इसे ज्यादा दिलचस्प बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। हर असाइनमेंट की सिर्फ जाँच-पड़ताल करने की जगह मूल्यांकन के तरीके पर नए सिरे से सोच रहे हैं। जैसे कि ज्याद मौखिक परीक्षाओं का होना, व्यावहारिक समस्याओं को हल करना, और टीमवर्क या बार-बार काम में सुधार करते हुए आगे बढ़ना।
ऐसा भी हो सकता है कि इस प्रक्रिया से एआई (AI) ऐसा योगदान दे, जिसकी कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी। इससे यूनिवर्सिटीज यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगी कि वे असल में बच्चों में किस प्रकार की योग्यता का मूल्यांकन करने का प्रयास कर रहे थे।
जो संस्थान उचित तरीके से इस दिशा में काम कर रहे हैं, उनकी सोच भी आपको एक जैसी ही मिलेगी। सबसे पहले वे हर नए फीचर के पीछे नहीं भागते। वो कुछ खास चीजों जैसे स्टूडेंट सपोर्ट, फीडबैक में आने वाली रुकावटें, असेसमेंट डिजाइन से शुरुआत करते हैं और उसके बाद वो इस बात पर फोकस करते हैं कि क्या कोई टूल इसमें मदद करता है या नहीं।
यह तकनीक को अपने लिए अपनाने के नजरिए से बिल्कुल अलग है। हायर एजुकेशन में एआई का इस्तेमाल एक ईमानदार सुझाव है यानि जिस पर भरोसा किया जा सके। हांलाकि एआई के इस्तेमाल को लेकर इन सिस्टम्स के लिए सबसे मजबूत तर्क कभी भी यह नहीं था कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया जाए। बल्कि मुख्य बात यह थी कि अगर सावधानीपूर्वक तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, तो इससे शिक्षा के कुछ हिस्सों को बेहतर बनाने की कोशिश की जा सकती हैं।
शिक्षा की बात करें, तो आज भी इंसानी समझ, बौद्धिक बहस, मेंटरशिप और क्लासरूम में होने वाले उन अनपेक्षित पलों पर निर्भर करती है जब नए विचार एक दम से दिमाग में आते हैं। इस गतिविधि को कोई भी सॉफ्टवेयर रिप्लेस नहीं कर सकता है और करना भी नहीं चाहिए।
तकनीक की भूमिका तब प्रभावी मानी जाएगी, जब वह शिक्षकों को शैक्षणिक क्षणों के लिए अधिक समय और अवसर उपलब्ध कराने में मदद करे। वहीं हायर एजुकेशन के लिए एआई का रोल जितना बड़ा बताया गया था, हांलाकि उतना व्यापक नहीं है, लेकिन यह महत्वपूर्ण हो सकता है।