लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी तेज होता जा रहा है। बीजेपी और समाजवादी पार्टी अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे और वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार कैंपेन चला रही हैं। ऐसे में यूपी की सियासत में एक नई लड़ाई ‘डिजिटल नैरेटिव’ की बनती दिखाई दे रही है।एक तरफ बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए सुरक्षा, सुशासन, विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रमुख मुद्दा बना रही है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी PDA, जातीय जनगणना, बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है।
एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई पर सपा के सवाल
समाजवादी पार्टी और पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अक्सर पुलिस कार्रवाई, एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई से जुड़ी तस्वीरें और आंकड़े साझा किए जाते हैं। सपा का आरोप रहा है कि कई मामलों में पुलिस कार्रवाई निष्पक्ष नहीं है और इसमें जातीय पूर्वाग्रह की भूमिका दिखाई देती है।पार्टी ‘फर्जी एनकाउंटर’ और पुलिस कस्टडी में मौत जैसे मुद्दों को उठाकर सरकार के कानून-व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े करती रही है। सोशल मीडिया के जरिए इन मुद्दों को युवाओं और पिछड़े वर्ग के बीच पहुंचाने की रणनीति भी दिखाई देती है।
BJP का ‘सांस्कृतिक हिंदुत्व’ मॉडल
वहीं बीजेपी के डिजिटल कैंपेन में अयोध्या के राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और महाकुंभ जैसे बड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों की तस्वीरें और वीडियो प्रमुखता से दिखाई देते हैं। हाई-क्वालिटी वीडियो, ड्रोन शॉट्स और शॉर्ट रील्स के जरिए पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास का संदेश जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
इसके साथ ही सरकार की विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों के वीडियो भी सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं। इन कैंपेन के जरिए गैर-यादव ओबीसी, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखने की कोशिश की जा रही है।
अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला
समाजवादी पार्टी की डिजिटल रणनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक प्रमुख केंद्र में है। पार्टी का सोशल मीडिया कैंपेन जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार आगे बढ़ा रहा है।
सपा का नैरेटिव है कि पिछड़े और दलित वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में अधिकार और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। आरक्षण और जातीय जनगणना जैसे मुद्दों के जरिए पार्टी अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश कर रही है।
परिवारवाद बनाम बेरोजगारी की लड़ाई
आर्थिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर भी बीजेपी और सपा के बीच डिजिटल वार-पलटवार जारी है। बीजेपी अपने सोशल मीडिया कंटेंट में सपा सरकार के पुराने कार्यकाल को ‘गुंडाराज’ और ‘परिवारवाद’ से जोड़कर निशाना बनाती है। वहीं सपा बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, महंगाई और युवाओं से जुड़े रोजगार के सवालों को प्रमुखता से उठाती है।अखिलेश यादव के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अभ्यर्थियों के प्रदर्शन, रोजगार से जुड़े मुद्दों और सरकारी विभागों में खाली पदों से संबंधित पोस्ट अक्सर देखने को मिलती हैं।
मीम्स और लोकल इन्फ्लुएंसर्स की बढ़ी भूमिका
2027 की डिजिटल सियासत में राजनीतिक दलों के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के अलावा मीम पेज, लोकल इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। राजनीतिक संदेशों को छोटे वीडियो, मीम्स, गानों और व्यंग्यात्मक कंटेंट के जरिए युवा वर्ग तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
कुल मिलाकर, यूपी का 2027 विधानसभा चुनाव अब सिर्फ रैलियों, जनसभाओं और बूथ मैनेजमेंट तक सीमित नहीं रहने वाला। मोबाइल स्क्रीन भी चुनावी राजनीति का बड़ा मैदान बन चुकी है। बीजेपी जहां सुरक्षा, सुशासन, विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, वहीं सपा PDA, सामाजिक न्याय और युवाओं से जुड़े मुद्दों के जरिए राजनीतिक चुनौती पेश कर रही है। अब बड़ा सवाल यही है कि सोशल मीडिया पर बनने वाला यह डिजिटल नैरेटिव 2027 के चुनावी मैदान में कितना असर डाल पाता है।