मांगें जायज़ थीं, पर आंदोलन की मर्यादा क्यों टूटी?

लोकतंत्र केवल मतपेटियों से नहीं चलता; वह नागरिकों की असहमति, संवाद और प्रतिरोध की संस्कृति से भी जीवित रहता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में आंदोलन सत्ता और समाज के बीच संवाद का एक सशक्त माध्यम होते हैं। जब व्यवस्था नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तब सड़कों पर उठने वाली आवाज़ें लोकतंत्र की चेतना का प्रमाण बनती हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आंदोलन की शक्ति उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसके नैतिक चरित्र और अनुशासन में निहित होती है। जिस क्षण आंदोलन मर्यादा की सीमाएँ लांघकर हिंसा, तोड़फोड़ और अराजकता का पर्याय बन जाता है, उसी क्षण उसका नैतिक बल क्षीण होने लगता है।

आज की युवा पीढ़ी—जिसे ‘जनरेशन ज़ेड’ कहा जाता है—देश की सबसे शिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष और जागरूक पीढ़ी मानी जाती है। रोजगार, शिक्षा में पारदर्शिता, निष्पक्ष भर्ती, सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता जैसे मुद्दों पर उसकी बेचैनी स्वाभाविक भी है और लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी। किसी भी राष्ट्र का भविष्य तभी सुरक्षित हो सकता है, जब उसके युवाओं की आकांक्षाओं को सम्मान मिले। इसलिए यदि युवा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं, तो इसे लोकतांत्रिक चेतना का सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए।

किन्तु प्रश्न यह है कि क्या न्यायोचित मांगें किसी भी प्रकार के प्रदर्शन को उचित ठहरा देती हैं? क्या सार्वजनिक संपत्ति को जलाना, यातायात अवरुद्ध करना, सरकारी संस्थानों पर हमला करना अथवा आम नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त कर देना लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्वीकार्य स्वरूप हो सकता है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है। लोकतंत्र अधिकार देता है, किंतु वह उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; एक की उपेक्षा दूसरे को भी अर्थहीन बना देती है।

यह स्मरण रखना होगा कि सार्वजनिक संपत्ति किसी सरकार की नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक पूँजी है। एक बस, एक रेलवे स्टेशन, एक सरकारी भवन या एक सड़क केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं होती, बल्कि उसमें करोड़ों करदाताओं का धन, श्रम और विश्वास निहित होता है। उसे क्षति पहुँचाकर कोई भी आंदोलन अंततः अपने ही समाज को नुकसान पहुँचाता है। विडंबना यह है कि ऐसी घटनाओं के बाद चर्चा युवाओं की समस्याओं पर नहीं, बल्कि हिंसा और कानून-व्यवस्था पर केंद्रित हो जाती है। इस प्रकार वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और आंदोलन अपनी नैतिक बढ़त खो देता है।

भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस संदर्भ में एक महान उदाहरण प्रस्तुत करता है। महात्मा गांधी ने यह सिद्ध किया था कि नैतिक शक्ति किसी भी दमनकारी सत्ता से अधिक प्रभावशाली हो सकती है। सत्याग्रह की शक्ति लाठी या आगजनी में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और नैतिक साहस में निहित थी। यही कारण है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि नैतिक आंदोलन भी बन सका। इतिहास यह भी बताता है कि जिन आंदोलनों ने संयम बनाए रखा, वे जनसमर्थन अर्जित करने में अधिक सफल रहे; जबकि हिंसक आंदोलनों ने स्वयं अपने उद्देश्य को कमजोर किया।

हालाँकि पूरी जिम्मेदारी केवल आंदोलनकारियों पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। जब युवाओं की समस्याएँ वर्षों तक अनसुनी रह जाएँ, जब भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप लगें, जब संवाद के स्थान पर मौन और आश्वासनों के स्थान पर विलंब दिखाई दे, तब असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में सरकार की पहली जिम्मेदारी संवाद स्थापित करना है, न कि परिस्थितियों को इस सीमा तक पहुँचने देना जहाँ सड़कें ही अंतिम विकल्प बन जाएँ। संवेदनशील शासन और उत्तरदायी नागरिक—दोनों मिलकर ही स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण करते हैं।

सोशल मीडिया के इस युग में आंदोलनों का प्रभाव पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गया है। एक छोटी-सी घटना पूरे आंदोलन की छवि निर्धारित कर देती है। यदि कुछ असामाजिक तत्व हिंसा का सहारा लेते हैं, तो पूरी पीढ़ी की वैध चिंताएँ भी संदेह के घेरे में आ जाती हैं। इसलिए आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे भावनाओं को अनुशासन से जोड़ें और विरोध को सकारात्मक दिशा दें।

आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की है। सरकार को चाहिए कि वह युवाओं की जायज़ मांगों को गंभीरता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ सुने। वहीं युवाओं को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली आवाज़ वही होती है, जो संयम, तर्क और नैतिक बल से उठती है, न कि हिंसा और भय के वातावरण से।

अंततः कहा जा सकता है कि जनरेशन ज़ेड की मांगें यदि न्यायपूर्ण थीं, तो उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिलना स्वाभाविक था। दुर्भाग्य यह रहा कि कुछ स्थानों पर प्रदर्शन की मर्यादा भंग होने से आंदोलन की नैतिक ऊँचाई प्रभावित हुई। लोकतंत्र में अधिकारों की लड़ाई तभी सफल होती है, जब वह संविधान की मर्यादाओं, कानून के सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ लड़ी जाए। इतिहास हमेशा उन्हीं आंदोलनों को याद रखता है, जिन्होंने व्यवस्था को चुनौती तो दी, पर समाज की मर्यादा को कभी चुनौती नहीं बनने दिया।

लेखक: डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह

परिचय: पोस्ट डॉक्टोरल फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली)

रश्मि सिंह मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और मीडिया एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ग्राउंड रिपोर्टिंग और कंटेंट लेखन से की तथा समय के साथ देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों और समाचार चैनलों में कार्य किया। राजनीति, समसामयिक घटनाक्रम, उत्तर प्रदेश की खबरों, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन जगत की रिपोर्टिंग एवं विश्लेषण में उन्हें विशेष अनुभव प्राप्त है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने तथ्यपरक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता को अपनी पहचान बनाया है।

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