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सियासत का शोर बनाम सुप्रीम कोर्ट का रिकॉर्ड: फॉर्म 6 और SIR विवाद का पूरा सच

सियासत का शोर बनाम सुप्रीम कोर्ट का रिकॉर्ड: फॉर्म 6 और SIR विवाद का पूरा सच

चुनाव आयोग और मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) को लेकर मीडिया और सियासी गलियारों में बयानों, आरोपों और तरह-तरह की दलीलों की भरमार है। लेकिन इस पूरे हंगामे के बीच एक सीधा और बुनियादी सवाल दब जाता है कि आखिर अदालत के दस्तावेजों (न्यायिक रिकॉर्ड) में दर्ज सच क्या है? अगर हम इस कानूनी रिकॉर्ड को गहराई से समझें, तो दो अलग-अलग मुद्दे सामने आते हैं, जिन्हें अक्सर एक ही तराजू में तौल दिया जाता है। पहला मुद्दा 'फॉर्म 6' और विशेष पुनरीक्षण के दौरान मांगी जाने वाली अतिरिक्त घोषणा से जुड़ा है। दूसरा मुद्दा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसके फैसले लेने की प्रक्रिया पर उठे सवालों का है।इन दोनों के बीच का फर्क समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि पूरा विवाद इसी पर टिका है।


फॉर्म 6: बदलाव या अतिरिक्त घोषणा?
विवाद तब बढ़ा जब चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट में दावा किया कि "SIR के लिए फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।" आलोचकों ने इसे यूं समझा कि कोर्ट ने बदले हुए यानी 'मॉडिफाइड' फॉर्म 6 को मंजूरी दे दी है। लेकिन कानूनी भाषा में इन दोनों बातों का मतलब एक नहीं होता। 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम जोड़ने के लिए किया जाता है। रिकॉर्ड्स साफ बताते हैं कि खुद फॉर्म 6 में बदलाव करना और उसके साथ एक अलग से घोषणा पत्र (अतिरिक्त दस्तावेज) संलग्न करना दो बिल्कुल अलग प्रक्रियाएं हैं।

यह अंतर सुप्रीम कोर्ट के बिहार SIR से जुड़े फैसले को पढ़ने पर और स्पष्ट होता है। अदालत ने माना कि मतदाता सूची के सामान्य संशोधन और 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के नियम एक जैसे नहीं हो सकते। विशेष पुनरीक्षण के दौरान चुनाव आयोग के पास यह अधिकार होता है कि वह स्थिति के हिसाब से अतिरिक्त दस्तावेज मांग सके, हालांकि यह अधिकार असीमित नहीं है। इसके पीछे की व्यावहारिक वजह भी समझिए। कोर्ट के सामने जो आंकड़े रखे गए, वे बताते हैं कि पिछले दो दशकों में शहरीकरण और तेजी से हुए प्रवास के कारण जनसांख्यिकी में बड़े बदलाव आए हैं। ऐसे में एक विशेष पुनरीक्षण अभियान, आम संशोधनों से अलग प्रशासनिक माहौल में काम करता है। इसीलिए नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 के साथ आदेश के 'अनेक्सचर-डी' में एक घोषणा पत्र भरना अनिवार्य किया गया था।

कोर्ट ने इस बात की भी जांच की कि क्या यह व्यवस्था मनमानी है? रिकॉर्ड्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अतिरिक्त दस्तावेज मांगने का फैसला प्रशासनिक समझ बूझ का हिस्सा था, जिसका मकसद मतदाता सूची की पवित्रता और सटीकता को बनाए रखना था। अदालत ने इसे तर्कसंगत माना और यह नहीं पाया कि यह कानून के खिलाफ या मनमाना है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि अदालत के इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं था कि आयोग द्वारा फॉर्म 6 के किसी भी भावी डिजिटल प्रारूप या उसमें किए गए बदलावों को पहले ही हरी झंडी मिल गई थी।


5 अक्टूबर की सुनवाई और कोर्ट का रुख
यही वजह है कि 5 अक्टूबर को हुई सुनवाई बेहद अहम हो जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने साफ किया कि कोर्ट ने किसी भी "संशोधित" फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी। पीठ ने कहा कि वह रिकॉर्ड देखकर यह जांचना चाहती है कि वास्तव में क्या बदलाव किए गए और वे किसके आदेश पर हुए।
यानी, मामला दो अलग-अलग कानूनी सवालों का है:-
बिहार SIR फैसला चुनाव आयोग के उस अधिकार से जुड़ा था, जिसके तहत वह विशेष अभियान के लिए अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकता है। 5 अक्टूबर की सुनवाई का सवाल यह था कि क्या मूल फॉर्म 6 में ही बदलाव कर दिया गया, और यदि हां, तो इसके लिए अधिकार कहां से मिला । मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे गंभीर आरोपों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट का रुख सबूतों और संस्थागत प्रक्रियाओं पर ही आधारित रहा। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि SIR से जुड़े फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। इन दलीलों में मुख्य रूप से 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक जांच-पड़ताल को आधार बनाया गया था। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की पीठ ने संबंधित पक्षों को नोटिस तो जारी किया, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत निलंबित करने की मांग से इनकार कर दिया।

कोर्ट का यह फैसला काफी मायने रखता है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि कोई अखबार की रिपोर्ट पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या आंशिक रूप से गलत हो सकती है, लेकिन सिर्फ उसके आधार पर अदालत कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले उसे चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब और मूल रिकॉर्ड देखना होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि फैसले तय प्रक्रिया को दरकिनार करके लिए गए हैं, तो उन्हें बाद में रद्द किया जा सकता है।

यह न तो आरोपों को खारिज करना है और न ही चुनाव आयोग को क्लीन चिट देना। इसे कानून की भाषा में 'ड्यू प्रोसेस' यानी निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया कहते हैं। दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का रुख यह रहा है कि एक बहु सदस्यीय संस्था में आंतरिक चर्चा के दौरान विचारों का मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन SIR से जुड़े अंतिम फैसले संस्थागत मंजूरी से ही लिए गए थे। आयोग के 26 सितंबर के प्रेस नोट में कहा गया था कि बिहार SIR आदेश और बाद के शेड्यूल को पूरे आयोग की सर्वसम्मति से मंजूरी मिली थी।

संस्थागत स्थिरता और लोकतांत्रिक ढांचा
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि केवल आरोपों के आधार पर इस मोड़ पर CEC को निलंबित कर दिया जाए, तो देश में चुनाव संचालन का क्या होगा? यह सिर्फ एक प्रक्रियात्मक सवाल नहीं था। किसी संवैधानिक संस्था के मूल रिकॉर्ड्स की जांच किए बिना उसके प्रमुख को हटाने का असर पूरे देश की चुनावी व्यवस्था पर पड़ सकता है। इस पूरे विवाद के केंद्र में कोई व्यक्ति या राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुचिता (इंटीग्रिटी) का सवाल है। SIR का मुख्य मकसद ही फर्जी, दोहरे या अमान्य नामों को हटाकर एक साफ-सुथरी मतदाता सूची तैयार करना है। एक सटीक मतदाता सूची महज कोई कागजी कार्रवाई नहीं है, यह निष्पक्ष और पारदर्शी लोकतंत्र की नींव है। इसीलिए चुनाव आयोग जैसी संस्था की समीक्षा और उस पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है। लेकिन यह समीक्षा केवल धारणाओं या दावों पर नहीं, बल्कि पक्के रिकॉर्ड्स और सबूतों पर टिकी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अब वही मूल रिकॉर्ड्स मंगवाए हैं। जब चारों तरफ बयानों का शोर हो, तब सच्चाई तक पहुंचने के लिए ध्यान सिर्फ और सिर्फ इन कागजी सबूतों पर होना चाहिए।

शिवकुमार राजपूत वरिष्ठ पत्रकार

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