शरणार्थियों के संघर्ष और मेहनत से बसा एनआईटी फरीदाबाद, पांच करोड़ का काम आधे बजट में पूरा किया

17 अक्टूबर 1949 को एनएच-5 में चला था पहला फावड़ा, विभाजन का दर्द झेलकर आए लोगों ने अपने हाथों से गढ़ी नई पहचान
कविता। फरीदाबादविभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। पाकिस्तान के सीमावर्ती फ्रंटियर क्षेत्र के बन्नू, कोहाट, मर्दान, पेशावर, डेरा इस्माइल खान, मुल्तान और डेरा गाजी खान सहित विभिन्न इलाकों से उजड़कर आए शरणार्थियों ने जब भारत में नए जीवन की शुरुआत करने का संकल्प लिया, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती रहने के लिए ठिकाना तलाशने की थी। इन्हीं विस्थापित परिवारों के संघर्ष, एकजुटता और मेहनत की बदौलत एनआईटी फरीदाबाद की नींव पड़ी। 17 अक्टूबर 1949 का दिन इसी ऐतिहासिक यात्रा का साक्षी बना, जब एनएच-5 स्थित आईटीआई के पास पहला फावड़ा चलाकर नए शहर के निर्माण की शुरुआत की गई।
किया सत्याग्रह:
विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थी दिल्ली के आसपास बसना चाहते थे। बताया जाता है कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से दिल्ली के निकट बसाने का अनुरोध किया था, जबकि सरकार उन्हें राजस्थान के अलवर और भरतपुर जैसे जिलों में बसाने की इच्छुक थी। इसके विरोध में शरणार्थियों ने सत्याग्रह शुरू किया। इस आंदोलन में सरकार कल्याण सिंह, कन्हैया लाल खट्टक, श्रीचंद खत्री, सुखराम सलार, अमीचंद दुआ और खामोश सरहदी सहित कई लोगों की भूमिका उल्लेखनीय रही।30 हजार लोगों के लिए था शहर का खाका:
एनआईटी शहर को शुरुआती तौर पर लगभग 30 हजार लोगों के रहने के लिए बसाने की योजना बनाई गई थी। इसके तहत पांच हजार मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया और सरकार ने पांच करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मेहनतकश शरणार्थियों ने अपनी भागीदारी और श्रम से इस निर्माण कार्य को लगभग आधे बजट में पूरा करने में योगदान दिया। यह केवल मकानों का निर्माण नहीं था, बल्कि उन परिवारों के लिए नई जिंदगी की नींव थी, जिन्होंने विभाजन में अपना सब कुछ खो दिया था।रखी गई नींव:
17 अक्टूबर 1949 को सुबह 11 बजे तत्कालीन तालीमी संघ की संयुक्त सचिव आशा रानी के नेतृत्व में एनएच-5 स्थित आईटीआई के पास पहला फावड़ा चलाया गया। इसी के साथ एनआईटी के निर्माण की औपचारिक शुरुआत हुई। शहर का नक्शा जर्मन वास्तुकार निस्सन ने तैयार किया था। इसे विकसित करने के लिए गठित विकास बोर्ड में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एलसी जैन जैसे गणमान्य व्यक्तियों के शामिल होने का उल्लेख मिलता है। आज एनआईटी फरीदाबाद औद्योगिक गतिविधियों, बाजारों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए जाना जाता है। लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान उन शरणार्थियों के संघर्ष से जुड़ी है, जिन्होंने विस्थापन के दर्द को अपनी ताकत बनाया। एनआईटी का स्थापना दिवस उन लोगों के साहस, श्रम और सामूहिक संकल्प को याद करने का अवसर है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में एक नए शहर को आकार दिया।--------------------------------------
एनआईटी फरीदाबाद का स्थापना दिवस शहर की विकास यात्रा का प्रतीक : डॉ. राजेश भाटिया
पायनियर समाचार सेवा। फरीदाबाद
सिद्धपीठ श्री हनुमान मंदिर महाबीर दल, मार्केट नंबर-1 और पंजाबी सभा की ओर से दशहरा मैदान में तैयार की गई लंका में शनिवार को एनआईटी फरीदाबाद का स्थापना दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़खल के विधायक धनेश अदलखा ने केक काटकर शहरवासियों के साथ खुशियां साझा कीं।
विधायक ने स्थापना दिवस की शुभकामनाएं देते हुए क्षेत्र की उन्नति, खुशहाली और निरंतर विकास की कामना की। उन्होंने कहा कि फरीदाबाद का औद्योगिक और सामाजिक क्षेत्र में विशेष महत्व है। शहर की प्रगति में नागरिकों और सामाजिक संस्थाओं का अहम योगदान रहा है। सिद्धपीठ श्री हनुमान मंदिर के प्रधान डॉ. राजेश भाटिया ने कहा कि एनआईटी फरीदाबाद का स्थापना दिवस शहर के इतिहास और विकास यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है। ऐसे आयोजन शहर की उपलब्धियों पर गर्व करने और उज्ज्वल भविष्य के लिए मिलकर काम करने की प्रेरणा देते हैं। पंजाबी सभा के प्रधान राजकुमार वोहरा ने कहा कि स्थापना दिवस जैसे अवसर आपसी भाईचारे और एकता की भावना को मजबूत करते हैं। उन्होंने शहरवासियों को शुभकामनाएं देते हुए फरीदाबाद की निरंतर उन्नति और समृद्धि की कामना की।



