20 साल से उजड़ा पड़ा निचलौल बस डिपो, कभी दिल्ली तक दौड़ती थीं बसें, आज झाड़ियों में दबा है वजूद

निचलौल, महराजगंज।कभी गन्ने की मिठास से गुलजार रहा परिसर, फिर रोडवेज बसों की रफ्तार से क्षेत्र की पहचान बना। आज वही परिसर झाड़ियों और वीराने में गुम है। कभी यहां से दिल्ली तक रोडवेज बसें दौड़ती थीं और बसों पर लिखा 'निचलौल डिपो' क्षेत्र के गौरव का प्रतीक था। आज न बसों की कतार है, न यात्रियों की चहल-पहल और न ही डिपो के नाम की पहचान। दो दशक से अधिक समय से उजड़ा पड़ा यह परिसर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।निचलौल बस डिपो का इतिहास भी इस परिसर की तरह उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष 1980 के दशक में यहां खाड़सारी चीनी मिल संचालित होती थी। गन्ने से लदी बैलगाड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रालियों की आवाजाही से परिसर गुलजार रहता था। मिल बंद हुई तो सन्नाटा पसर गया। वर्ष 1989 में इसी परिसर को निचलौल बस डिपो के रूप में नई पहचान मिली। गन्ने से लदी गाड़ियों की जगह रोडवेज बसों ने ले ली। यात्रियों और कर्मचारियों की आवाजाही बढ़ी तो आसपास दुकानें भी सजने लगीं। क्षेत्र को यातायात सुविधा के साथ रोजगार और कारोबार का सहारा मिला।
2007 में थमी रफ्तार, नहीं लौटी रौनक
लगातार बारिश के बाद जलभराव को आधार बनाकर वर्ष 2007 में डिपो को अस्थायी तौर पर जिला मुख्यालय स्थानांतरित कर दिया गया। बरसात बीत गई, लेकिन बसें वापस नहीं लौटीं। स्थानीय लोगों ने वापसी के लिए आंदोलन किया। तत्कालीन एआरएम का लिखित आश्वासन भी मिला, मगर नतीजा सिफर रहा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जलभराव के अलावा कुछ कर्मचारियों के निजी स्वार्थ भी डिपो स्थानांतरण की वजह बने। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
डिपो उजड़ा तो कमजोर हुई क्षेत्र की पहचान
डिपो की वापसी का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक मंचों पर उठता रहा, लेकिन दो दशक बाद भी परिसर आबाद नहीं हो सका। कभी बसों पर चमकने वाला 'निचलौल डिपो' का नाम भी अब गायब हो चुका है। इसका असर केवल परिवहन सुविधा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बसों की आवाजाही पर निर्भर आसपास के छोटे कारोबार और रोजगार पर भी पड़ा। आज परिसर झाड़ियों से घिरा है और कभी गुलजार रहने वाली जगह सन्नाटे की गवाही दे रही है।चीनी मिल की मिठास से शुरू हुआ सफर रोडवेज की रफ्तार तक पहुंचा, लेकिन अब बदहाली पर आकर ठहर गया है। सवाल है कि जिस डिपो ने निचलौल को दिल्ली तक से जोड़ा, उसकी वापसी की राह आखिर किसने रोक रखी है? स्थानीय लोगों को आज भी उस दिन का इंतजार है, जब इस उजड़े परिसर में फिर बसों के हॉर्न गूंजेंगे और 'निचलौल डिपो' की पहचान लौटेगी।



