...मोहब्बत के समंदर में अकेली है मेरी कश्ती, तुम्हारा साथ हो तो मेरी कश्ती पार हो जाए
-कविताओं की महफिल में भोर तक गूंजती रहीं तालियां, पालिका प्रांगण में सजे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश भर के कवियों ने बांधा समां

खतौली। पालिका प्रांगण सोमवार रात कविता, हास्य और भावनाओं के रंग में सराबोर रहा। मौका था अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का, जहां देश भर से आए कवियों ने अपनी रचनाओं से ऐसा समां बांधा कि रात कब बीत गई, श्रोताओं को इसका अहसास तक नहीं हुआ। हास्य-व्यंग्य से ठहाके गूंजे तो श्रृंगार और भावनात्मक रचनाओं ने श्रोताओं को बांधे रखा। देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविताओं पर भी जमकर तालियां बजीं। देर रात के बाद भी पंडाल में श्रोताओं की भीड़ बनी रही और कवि सम्मेलन भोर तक चलता रहा। कवि सम्मेलन का शुभारंभ समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता श्यामलाल उर्फ बच्ची सैनी ने फीता काटकर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पालिका अध्यक्ष हाजी शाहनवाज लालू ने की। बनारस से पहुंचे प्रसिद्ध कवि दमदार बनारसी ने अपने चुटीले अंदाज में संचालन करते हुए देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा। मेरठ से आए कवि डॉ. प्रतीक गुप्ता ने खतौली की गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता को अपनी कविता के माध्यम से सामने रखा। उनकी पंक्तियां "चेहरे पर सबके मुस्कान देखो, जमीन देखो, आसमान देखो, हिंदू-मुसलमान की देखो अटूट एकता, इस खतौली में मेला नहीं, मेरा हिंदुस्तान देखो" सुनते ही पंडाल तालियों से गूंज उठा। श्रृंगार रस के कवि मोहन बिष्ट ‘मुंतज़िर’ ने प्रेम और दीवानगी को अपने अंदाज में प्रस्तुत कर श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। उनकी पंक्तियां "मजनू, रांझा थोड़े पागल होते हैं, दुनिया वाले पूरे पागल होते हैं। पागल कहता है पागल हो जाऊंगा, देखो कैसे-कैसे पागल होते हैं" पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं। कवयित्री डॉ. शिखा दीप्ति दीक्षित ने भावपूर्ण श्रृंगारिक रचनाओं से श्रोताओं को बांधे रखा। उनकी पंक्तियां "रूह को तार-तार मत करना, बेवजह एतबार मत करना। जो बना न सके तुम्हें दुल्हन, उस पर खुद को निसार मत करना" ने पंडाल में भावनात्मक माहौल बना दिया। कवयित्री राधिका मित्तल ने बेटी पर आधारित अपनी चर्चित रचना सुनाकर श्रोताओं की भावनाओं को छुआ। उनकी प्रस्तुति के दौरान कई श्रोता भावुक नजर आए। इसके बाद श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने प्रेम और विरह से जुड़ी रचना सुनाई। "तमन्ना है यही दिल की, तेरा दीदार हो जाए, तुझे देखूं मैं पल भर को, तुझी से प्यार हो जाए। मोहब्बत के समंदर में अकेली है मेरी कश्ती, तुम्हारा साथ हो तो मेरी कश्ती पार हो जाए" पर जमकर तालियां बजीं। कवि फैसल स्योहारवी ने प्रेम और त्याग की भावनाओं को शब्द देते हुए कहा, "मैं तमाशा बन गया हूं अब जमाने के लिए, खुद को रुसवा कर लिया तुमको बचाने के लिए।" उनकी प्रस्तुति को भी श्रोताओं ने खूब सराहा। संचालक दमदार बनारसी ने हास्य और व्यंग्य के तीर छोड़ते हुए कार्यक्रम में लगातार ऊर्जा बनाए रखी। सोशल मीडिया के दौर में बढ़ते दिखावे पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से कहा, "पल्लू उतर गए, ये दुपट्टे उतर गए, शर्म-ओ-हया के जहन से पर्दे उतर गए। थोड़े से व्यूज पाने के चक्कर में क्या कहें, कुछ बच्चियों के जिस्म से कपड़े उतर गए।" उनकी व्यंग्यात्मक प्रस्तुति पर भी पंडाल तालियों से गूंज उठा। कवि सम्मेलन जैसे-जैसे रात में आगे बढ़ता गया, श्रोताओं का उत्साह भी बढ़ता रहा। देर रात के बाद भी लोग अपनी जगहों पर डटे रहे। अलग-अलग रस और विषयों की कविताओं ने कार्यक्रम को भोर तक जीवंत बनाए रखा। पंडाल में लगातार तालियों की गूंज सुनाई देती रही। कार्यक्रम को सफल बनाने में संयोजक मास्टर सत्तार, अमित अहलावत, विशाल तोमर समेत पालिका के सभासदों का सहयोग रहा।



