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‘चमकीले दिन’ लाइन को हटाना चाहते थे फरहान अख्तर, जावेद अख्तर ने नहीं मानी बात; 25 साल बाद बना ‘दिल चाहता है’ की पहचान

फिल्म ‘दिल चाहता है’ को हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में गिना जाता है, जिन्होंने दोस्ती और युवाओं की जिंदगी को बिल्कुल नए अंदाज में पर्दे पर पेश किया। फिल्म की कहानी, किरदारों और संवादों के साथ-साथ इसका म्यूजिक भी आज तक…

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‘चमकीले दिन’ लाइन को हटाना चाहते थे फरहान अख्तर, जावेद अख्तर ने नहीं मानी बात; 25 साल बाद बना ‘दिल चाहता है’ की पहचान

फिल्म ‘दिल चाहता है’ को हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में गिना जाता है, जिन्होंने दोस्ती और युवाओं की जिंदगी को बिल्कुल नए अंदाज में पर्दे पर पेश किया। फिल्म की कहानी, किरदारों और संवादों के साथ-साथ इसका म्यूजिक भी आज तक लोगों के बीच लोकप्रिय है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्म के टाइटल ट्रैक की एक बेहद मशहूर लाइन को लेकर निर्देशक फरहान अख्तर खुद आश्वस्त नहीं थे? खास बात यह है कि उनके पिता और गीतकार जावेद अख्तर ने उस लाइन को हटाने से साफ इनकार कर दिया था।दरअसल, ‘दिल चाहता है’ के टाइटल सॉन्ग में इस्तेमाल हुआ ‘चमकीले दिन’ शब्द फरहान अख्तर को शुरुआत में बिल्कुल पसंद नहीं आया था। हाल ही में अनूपमा चोपड़ा के साथ बातचीत में फरहान ने इस दिलचस्प किस्से का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने ‘चमकीले’ शब्द सुना तो उनके दिमाग में विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाली भाषा आने लगी।

फरहान के मुताबिक, उन्हें यह शब्द कुछ ऐसा लगा जैसे विज्ञापनों में बार-बार ‘चमकीला-चमकीला’ कहा जाता है। यही वजह थी कि वह चाहते थे कि गाने में इस शब्द को बदल दिया जाए। यहां तक कि जब गाने की रिकॉर्डिंग शुरू हो गई, तब भी उनकी असहजता खत्म नहीं हुई थी।

जावेद अख्तर ने बताया क्यों खास है ‘चमकीले दिन’

फरहान की आपत्ति के बावजूद गीतकार जावेद अख्तर अपने लिखे हुए शब्द को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे। उनका मानना था कि ‘चमकीले दिन’ का इस्तेमाल ही इस गाने को दूसरों से अलग बनाएगा। जावेद अख्तर ने फरहान को समझाया कि यह शब्द आमतौर पर गानों में इस्तेमाल नहीं होता और यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

उनका तर्क था कि दोस्ती को बयां करने के लिए एक बिल्कुल अलग और नया शब्द गाने को खास पहचान दे सकता है। जावेद अख्तर का भरोसा इतना मजबूत था कि उन्होंने फरहान को इस लाइन को बनाए रखने के लिए मना लिया।

फरहान ने आखिरकार अपने पिता की बात मान ली, लेकिन रिकॉर्डिंग के दौरान भी उन्हें इस शब्द को लेकर पूरी तरह भरोसा नहीं था। उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि जब भी गाने में ‘चमकीले दिन’ आता था, उन्हें अजीब महसूस होता था।

25 साल बाद बदली तस्वीर

समय ने आखिरकार साबित कर दिया कि जावेद अख्तर का फैसला सही था। साल 2001 में रिलीज हुई ‘दिल चाहता है’ के टाइटल ट्रैक की पहचान ही उसकी अनोखी भाषा और दोस्ती को बयां करने वाले अंदाज से बनी। ‘चमकीले दिन’ आज गाने का ऐसा हिस्सा है, जिसकी कल्पना उसके बिना करना मुश्किल है।

फिल्म ने फरहान अख्तर को एक निर्देशक के तौर पर अलग पहचान दिलाई और युवाओं के बीच दोस्ती को देखने का नया नजरिया भी दिया। फिल्म की सफलता के साथ इसका संगीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ।

इस पूरे किस्से से फरहान और जावेद अख्तर के बीच रचनात्मक रिश्ते की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। फरहान फिल्म के निर्देशक थे, लेकिन उन्होंने उस समय दूसरे की रचनात्मक सोच पर भरोसा किया, जब उन्हें खुद उस पर संदेह था। करीब 25 साल बाद ‘चमकीले दिन’ उसी फैसले की याद दिलाता है—कभी-कभी किसी रचना की सबसे अलग चीज वही होती है, जो शुरुआत में सबसे अजीब लगती है।

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लेखक

Rashmi Singh

रश्मि सिंह मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और मीडिया एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ग्राउंड रिपोर्टिंग और कंटेंट लेखन से की तथा समय के साथ देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों और समाचार चैनलों में कार्य किया। राजनीति, समसामयिक घटनाक्रम, उत्तर प्रदेश की खबरों, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन जगत की रिपोर्टिंग एवं विश्लेषण में उन्हें विशेष अनुभव प्राप्त है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने तथ्यपरक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता को अपनी पहचान बनाया है।

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