पायनियर समाचार सेवा। चंपावत। चंपावत जिले की स्थापना के बाद 24वें जिलाधिकारी के रूप में मनीष कुमार ऐसे अधिकारी के रूप में सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी ‘क्विक एक्शन’ कार्यसंस्कृति और जनसमस्याओं को लटकाने, टरकाने तथा लोगों को गुमराह करने की परिपाटी पर प्रभावी विराम लगाकर आम लोगों के बीच प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा किया है। प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को जिस तरह उन्होंने कम किया है, उसे देखकर अब लोगों को लगने लगा है कि जिले में वास्तव में अच्छे दिन आने लगे हैं।मनीष कुमार ने गत वर्ष 21 जून को जिलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला था। अगले ही दिन जिले के अधिकारियों की बैठक में उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि आम जनता की बेहतरी के लिए ही हमें गाड़ी, घोड़ा और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, ऐसे में हमें यह देखना होगा कि हम जनता के लिए क्या कर रहे हैं? उनकी यह बात आम लोगों के प्रति उनकी संवेदनशील सोच और प्रशासनिक दृष्टिकोण को सामने ले आई। शुरूआत में काम के प्रति लापरवाह अधिकारियों को उनकी ये बातें कुछ अटपटी जरूर लगीं, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी कार्यशैली का असर पूरे प्रशासनिक तंत्र में स्पष्ट दिखाई देने लगा।
एक अरब रुपये से अधिक की धनराशि से बनी सड़क के चौड़ीकरण के बावजूद सड़क के डेंजर जोन स्वाला में वाहनों की गति कई दिनों तक प्रभावित रही तो जिलाधिकारी स्वयं दिन-रात वहां डटे रहे। दो पालियों में काम शुरू कराकर उसमें तेजी लाई गई। डीएम के बार-बार साइट पर पहुंचने से वहां काम कर रहे मजदूरों से भी उनका आत्मीय रिश्ता बन गया। यह रिश्ता उस समय और गहरा हो गया, जब होली, दीपावली आदि अवसरों पर वे मजदूरों को मिठाई खिलाकर उनके साथ त्योहार की खुशियां बांटते नजर आए।
जिले के मजदूरों और स्वच्छता सेवकों के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा, जब जिलाधिकारी ने उन्हें अपने आवास पर आमंत्रित कर अपने हाथों से भोजन परोसा। डीएम आवास पहली बार इस आत्मीयता का गवाह बना। किसान के बेटे मनीष कुमार का मानना है कि पर्यावरण मित्र मां की तरह हमारी सेवा करते आ रहे हैं और उनका सम्मान करना हमारा दायित्व है। प्रशासनिक पद की औपचारिकता से अलग उनका यह व्यवहार आम लोगों के मन में गहरी छाप छोड़ गया।ग्रामीण क्षेत्रों में रात 10 बजे तक फर्श पर बैठकर चौपाल लगाकर जिस तेजी से जनसमस्याओं का निस्तारण किया जा रहा है, उससे ग्रामीणों को डीएम के बारे में जो बातें सुनने को मिली थीं, उन्हें अपनी आंखों से देखने का मौका मिला। जिलाधिकारी ने दूरस्थ क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान ग्रामीणों की कठिनाइयों को महसूस करते हुए लोगों से कहा कि वे जिला मुख्यालय आने में अपना धन और समय बर्बाद करने के बजाय व्हाट्सऐप पर ही अपनी समस्या भेजें, अधिकारी स्वयं उनके पास पहुंचेंगे। यह सोच प्रशासन को कार्यालयों से निकालकर सीधे जनता के बीच ले जाने वाली साबित हुई है।पेयजल संकट से जूझ रहे लोगों की समस्याओं से मुंह मोड़ने वाले अधिकारी का जल संयोजन कटवाकर उन्होंने यह एहसास कराया कि पानी की दिक्कत क्या होती है। इस कार्रवाई ने प्रशासनिक जिम्मेदारी के प्रति एक स्पष्ट संदेश दिया। आज जिले का पूरा प्रशासनिक तंत्र पहले की अपेक्षा अधिक सक्रिय और सजग नजर आता है। दैवीय आपदा हो या सड़क दुर्घटना, राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर चलता दिखाई देता है। दुख की घड़ी में पीड़ित परिवार जिस राहत की अपेक्षा जिला प्रशासन से करता था, उससे आगे बढ़कर डीएम घटना के दूसरे दिन ही राजस्व कर्मियों को राहत सहायता के साथ उनके घर भेज रहे हैं।पहली बार यहां गंभीर रूप से घायलों को एयरलिफ्ट कर बेहतर उपचार दिलाकर लोगों का जीवन बचाने की दिशा में प्रभावी प्रयास किए गए। दुर्घटना में मौत होने पर शव को घर तक पहुंचाने की सुविधा दी जाती रही है। इतना ही नहीं, मृतकों के कागजात तैयार करने के लिए संबंधित विभागीय कर्मचारी स्वयं पीड़ित परिवार के पास पहुंचते हैं। जिले में चिकित्सा सुविधाओं को भी इस स्तर तक मजबूत करने का प्रयास हुआ है कि अब सामान्य से लेकर गंभीर रोगियों तक का उपचार जिले में ही उपलब्ध हो सके।
डीएम के कार्यभार संभालने के बाद से ही जनता दरबार नियमित रूप से लगना शुरू हुआ। उनकी कार्यशैली का ऐसा प्रचार हुआ कि जनता दरबार का हाल भी छोटा पड़ने लगा और फरियादियों के लिए बाहर बैठने की अलग व्यवस्था करनी पड़ी। जनता दरबार में उस समय बेहद भावुक क्षण देखने को मिले, जब डीएम ने फरियादी को अपने बगल में बैठाकर उसकी समस्या सुननी शुरू की। यह नजारा देखकर गरीब फरियादी अपना दुख भी भूलने लगे। उन्होंने ऐसा माहौल न पहले कभी देखा था और न सुना था। प्रशासनिक अधिकारी और आम फरियादी के बीच की दूरी को कम करने वाला यह व्यवहार लोगों के बीच विश्वास पैदा करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।इस छोटे से जिले में जनता दरबार और ह्यसरकार जनता के द्वारह्ण जैसे कार्यक्रमों से कितने लोग लाभान्वित हो रहे हैं, यह अपने आप में उल्लेखनीय है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री राहत कोष से भी जरूरतमंदों की मदद की जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आम लोगों की समस्याएं दूर करने के लिए सात लोगों को दर्जा राज्य मंत्री बनाया है, किंतु आम लोगों की सीधी पहुंच जिलाधिकारी तक होने से दर्जा राज्य मंत्रियों की भूमिका अपेक्षाकृत हल्की हो गई है।जिले में बड़ी संख्या में लोग समाज कल्याण विभाग की योजनाओं से जुड़ चुके हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों को जिलाधिकारी द्वारा इतना प्रोत्साहित किया गया है कि अब चूड़ी वाले हाथ होमस्टे, कैंटीन, कैफे हाउस, बेकरी और अन्य व्यवसायों से जुड़ते जा रहे हैं। पूरे जिले की महिलाओं के हाथों में आत्मनिर्भरता की जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह पहले देखने को नहीं मिली। महिलाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी बनाने के बजाय उन्हें स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़ने का यह प्रयास आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना के मॉडल जिले में जिस तरह प्रशासनिक मशीनरी तेजी से काम कर रही है, उसे देखते हुए विकास, विरासत और पलायन कर चुके लोगों को अपनी माटी से जोड़कर गांवों को आबाद करने की कवायद भी प्रभावी नजर आ रही है। जिलाधिकारी का यह कहना कि इतनी सुंदर आबोहवा के बीच रहने के लिए दिल्ली-मुंबई के लोग लालायित रहते हैं, फिर यहां के लोग क्यों घर-बार छोड़कर मैदानी क्षेत्रों की भीड़ का हिस्सा बन रहे हैं? लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है।डीएम की इस सोच ने लोगों में बड़ा वैचारिक बदलाव पैदा किया है। अब लोग अपने घरों को आबाद करने की बात सोच रहे हैं और गर्मियों के आठ माह तक यहां रहने लगे हैं। कई लोगों ने कृषि की ओर भी रुख करना शुरू कर दिया है। जिले में और क्या बेहतर किया जा सकता है, इसके लिए जिलाधिकारी जिले के पूर्व जिलाधिकारियों से लगातार संपर्क कर उनके अनुभव का लाभ ले रहे हैं। इससे प्रशासन में एक नई सोच पैदा हुई है और पुराने अनुभवों को वर्तमान आवश्यकताओं के साथ जोड़ने की पहल दिखाई दे रही है।
जिले की प्रतिभाओं के विकास और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी ने मैं आपके पीछे खड़ा हूं कहकर हर प्रतिभाशाली युवक-युवती को सम्मानित करने की परंपरा शुरू की है। इससे प्रतिभाओं का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। प्रतिभाओं को केवल सम्मानित करने तक सीमित न रहकर उनके भीतर आगे बढ़ने का विश्वास पैदा करना भी इस पहल की विशेषता है।सही मायने में देखा जाए तो डीएम मनीष कुमार की कार्यशैली से आम लोगों का जिला प्रशासन पर जो विश्वास कायम हुआ है, वह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। किसी भी प्रशासनिक अधिकारी की सफलता केवल सरकारी योजनाओं और आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि आम आदमी उसके कार्यालय और व्यवस्था को अपने कितना करीब महसूस करता है। इस दृष्टि से चंपावत में दिखाई दे रहा बदलाव महत्वपूर्ण है।यदि यही कार्यसंस्कृति और परिस्थितियां कायम रहीं तो जिले के विकास की गति और तेज होगी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना वाला चंपावत मॉडल जिला न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए प्रशासनिक संवेदनशीलता, त्वरित निर्णय और जनभागीदारी का एक उदाहरण बनकर उभर सकता है।
अपनी अलग कार्यशैली के कारण उत्तराखंड के अन्य अधिकारियों से अलग पहचान बना चुके हैं चंपावत के जिलाधिकारी मनीष कुमार
पायनियर समाचार सेवा। चंपावत। चंपावत जिले की स्थापना के बाद 24वें जिलाधिकारी के रूप में मनीष कुमार ऐसे अधिकारी के रूप में सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी ‘क्विक एक्शन’ कार्यसंस्कृति और जनसमस्याओं को लटकाने, टरकाने तथा लोगों को गुमराह करने की परिपाटी…