- UPCA की बीसीसीआई संबद्धता समेत सभी प्रमुख मांगों और आपत्तियों को भी अदालत ने नहीं माना
लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (UPCA) को बड़ी राहत देते हुए द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश (CAUP) की रिट याचिका खारिज कर दी। अदालत ने याचिका में उठाई गई सभी प्रमुख मांगों और आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए यूपीसीए की वैधानिक स्थिति बरकरार रखी।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने अपने फैसले में माना कि वर्ष 2005 में तत्कालीन सोसाइटी के विघटन के बाद उसकी परिसंपत्तियों, दायित्वों और कार्यों का उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन कंपनी को हस्तांतरण कानून के अनुरूप था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया के लिए राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक नहीं थी, क्योंकि सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि संस्था में उसका कोई वित्तीय योगदान या प्रत्यक्ष हित था।
अदालत ने UPCA की परिसंपत्तियां याचिकाकर्ता को सौंपने, बीसीसीआई को निर्देश जारी करने, UPCA को क्रिकेट गतिविधियों के संचालन से रोकने तथा सीबीआई या अन्य एजेंसी से जांच कराने की मांग भी खारिज कर दी। इसके साथ ही UPCA की बीसीसीआई संबद्धता और वित्तीय सहायता की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग भी स्वीकार नहीं की गई।
फैसले में यह भी दर्ज किया गया कि यूपीसीए पिछले लगभग दो दशकों से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का पूर्ण सदस्य है और उसे बोर्ड में मतदान का अधिकार प्राप्त है।
इस फैसले पर UPCA मीडिया कमेटी के सह-अध्यक्ष डॉ. संजय कपूर ने कहा कि उच्च न्यायालय के इस निर्णय से UPCA की वैधानिक स्थिति और अधिक स्पष्ट हो गई है। उन्होंने कहा कि CAUP द्वारा UPCA से मिलता-जुलता नाम इस्तेमाल किए जाने से खिलाड़ियों, जिला क्रिकेट संघों और आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस फैसले के बाद विवाद समाप्त होगा और सभी पक्ष उत्तर प्रदेश में क्रिकेट तथा खिलाड़ियों के विकास के लिए सकारात्मक माहौल में कार्य करेंगे।










