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जल, जीवन और जनभागीदारी: सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में भीषण गर्मी, जल संरक्षण और सामाजिक भागीदारी का उल्लेख किया है । जल संरक्षण आज के भारत और समूचे विश्व के लिए एक चेतावनी के समान प्रतीत होता है। मानव सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक…

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जल, जीवन और जनभागीदारी: सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में भीषण गर्मी, जल संरक्षण और सामाजिक भागीदारी का उल्लेख किया है । जल संरक्षण आज के भारत और समूचे विश्व के लिए एक चेतावनी के समान प्रतीत होता है। मानव सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, किंतु उसी अनुपात में प्रकृति के संसाधनों का दोहन भी बढ़ा है। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, घटता भूजल स्तर और जल संकट आज मानवता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में उपस्थित हैं। ऐसे समय में ‘‘जल, जीवन और जनभागीदारी’’ का विषय केवल पर्यावरणीय विमर्श नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। जल प्रकृति का ऐसा उपहार है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

 

पृथ्वी पर विद्यमान समस्त जैविक गतिविधियों का आधार जल ही है। मानव शरीर का अधिकांश भाग जल से निर्मित है, कृषि जल पर आधारित है, उद्योगों का संचालन जल से होता है और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र जल के संतुलन पर निर्भर करता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने जल को केवल एक पदार्थ नहीं, बल्कि जीवन का पर्याय माना है। वैदिक ऋषियों ने जल में देवत्व का अनुभव किया। ऋग्वेद में जल को औषधि, ऊर्जा और कल्याण का स्रोत कहा गया है। भारतीय सभ्यता की महान नदियाँ—गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी—केवल जलधाराएँ नहीं रहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना की वाहक बनीं। हमारे पूर्वजों ने जल को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि संरक्षण योग्य धरोहर माना। किन्तु आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में यह दृष्टि कहीं पीछे छूट गई। जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, अनियंत्रित भूजल दोहन और जल स्रोतों के प्रदूषण ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।

 

देश के अनेक क्षेत्रों में जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। अनेक नदियाँ सिकुड़ रही हैं। पारंपरिक तालाब और कुएँ समाप्त होते जा रहे हैं। वर्षा का स्वरूप भी अनिश्चित होता जा रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा और कभी दीर्घकालीन सूखा सामान्य घटना बनती जा रही है। वास्तव में जल संकट का मूल कारण केवल जल की कमी नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की कमी है। भारत में प्रतिवर्ष पर्याप्त वर्षा होती है, किंतु उसका बड़ा भाग बिना उपयोग के समुद्र में चला जाता है। यदि वर्षा जल का समुचित संचयन किया जाए, तो अनेक क्षेत्रों में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।यहीं पर ‘‘जनभागीदारी’’ की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। जल संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। सरकार योजनाएँ बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और नीतियाँ निर्धारित कर सकती है, किंतु जल की रक्षा तभी संभव है जब समाज स्वयं इसके लिए जागरूक और सक्रिय हो।

 

भारत का इतिहास जनभागीदारी के असंख्य उदाहरणों से भरा पड़ा है। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में लोगों ने वर्षा की प्रत्येक बूंद को संचित करने की अद्भुत परंपरा विकसित की। गुजरात की बावड़ियाँ, बुंदेलखंड के तालाब, दक्षिण भारत के विशाल जलाशय और पूर्वांचल के पोखरे इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय समाज ने सदियों तक सामुदायिक जल प्रबंधन की उत्कृष्ट व्यवस्था विकसित की थी। इन संरचनाओं का निर्माण केवल राजाओं द्वारा नहीं, बल्कि जनसहयोग और सामुदायिक सहभागिता से हुआ था। आज आवश्यकता है कि उस परंपरा को आधुनिक स्वरूप में पुनर्जीवित किया जाए। प्रत्येक गाँव में तालाबों का संरक्षण, प्रत्येक नगर में वर्षा जल संचयन और प्रत्येक परिवार में जल के विवेकपूर्ण उपयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी। यदि प्रत्येक नागरिक प्रतिदिन थोड़ी-सी सावधानी बरते, तो करोड़ों लीटर जल की बचत संभव है। जल संरक्षण का प्रश्न केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास से भी जुड़ा हुआ है। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है और कृषि की सफलता जल पर निर्भर करती है।

 

यदि जल संसाधन सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और सामाजिक असंतोष बढ़ेगा। इसलिए जल सुरक्षा वस्तुत: राष्ट्रीय सुरक्षा का ही एक स्वरूप है।इसके अतिरिक्त जल का संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी है। स्वच्छ जल उपलब्ध न होने के कारण अनेक रोग फैलते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लाखों लोग आज भी दूषित जल के कारण बीमारियों का शिकार होते हैं। इसलिए जल संरक्षण के साथ-साथ जल स्रोतों की स्वच्छता भी उतनी ही आवश्यक है। भारतीय चिंतन में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप लोकमंगल में निहित है। जो कार्य समाज और प्रकृति के हित में हो, वही धर्म है। इस दृष्टि से जल संरक्षण एक महान धार्मिक और नैतिक कर्तव्य है। यदि कोई व्यक्ति जल की एक-एक बूंद बचाने का प्रयास करता है, किसी तालाब के पुनर्जीवन में सहयोग देता है अथवा वृक्षारोपण करता है, तो वह वस्तुत: समाज और आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपना दायित्व निभा रहा होता है।गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है— परहित सरिस धरम नहिं भाई।’’ अर्थात् परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

 

जल संरक्षण से बड़ा परोपकार और क्या हो सकता है, क्योंकि इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ लाभान्वित होती हैं। आज जलवायु परिवर्तन के युग में वृक्षारोपण और जल संरक्षण को एक साथ देखने की आवश्यकता है। वृक्ष वर्षा को आकर्षित करते हैं, भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं। इसलिए प्रत्येक जल अभियान को हरित अभियान से भी जोड़ना होगा। जल और वन एक-दूसरे के पूरक हैं; एक के बिना दूसरे की सुरक्षा संभव नहीं। शिक्षा संस्थानों, धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय निकायों को इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। विद्यालयों में बच्चों को जल संरक्षण का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। मंदिरों, आश्रमों और सामुदायिक संगठनों को जल स्रोतों के संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देना चाहिए। मीडिया और सामाजिक मंचों को भी इस विषय पर निरंतर जनजागरण करना होगा। यह सुखद तथ्य है कि देश के अनेक भागों में जल संरक्षण को लेकर सकारात्मक प्रयास हो रहे हैं। अनेक गाँवों ने अपने सूख चुके तालाबों को पुनर्जीवित किया है। वर्षा जल संचयन की नई तकनीकें अपनाई जा रही हैं। समाज के विभिन्न वर्ग इस दिशा में आगे आ रहे हैं। किंतु अभी यह प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है कि जल संरक्षण को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाया जाए।

 

वर्तमान समय में जब पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और जल संकट वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है, तब भारत के पास अपनी पारंपरिक जल संस्कृति से दुनिया को दिशा देने का अवसर है। यदि हम अपने प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर सकें, तो न केवल अपने देश की जल समस्या का समाधान कर सकते हैं, बल्कि विश्व के लिए भी एक आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं। अंतत: यह समझना होगा कि जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है; और उसका संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। जल की प्रत्येक बूंद भविष्य की सुरक्षा है। जनभागीदारी के बिना जल संरक्षण संभव नहीं और जल संरक्षण के बिना सतत विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। आज आवश्यकता किसी एक योजना की नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प की है—जल बचाएँ, जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें, वर्षा जल का संचयन करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखें। क्योंकि जब समाज जल के प्रति जागरूक होगा, तभी राष्ट्र समृद्ध होगा; और जब जल सुरक्षित रहेगा, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। यही भविष्य के भारत का सबसे बड़ा पर्यावरणीय, सामाजिक और नैतिक संकल्प होना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

डॉ. देवेंद्र सिंह

प्रधान संपादक हिन्दी पानियर