चुनाव की आहट के बीच बढ़ी नेताओं के इर्द-गिर्द चाटुकारों की भीड़

विनय सिंह। बाराबंकी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही जिले की सियासत में नेताओं के इर्द-गिर्द चाटुकारों की सक्रियता बढ़ने लगी है। वर्तमान विधायकों से लेकर विभिन्न दलों के संभावित प्रत्याशियों तक अपनी नजदीकियां बढ़ाने की होड़ दिखाई देने लगी है। इस बीच विषम परिस्थितियों में पार्टी और नेता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले कर्मठ कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ नेताओं के आसपास ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, जो उनकी हर बात पर सहमति जताकर उन्हें चुनावी जीत के सपने दिखा रहे हैं। वहीं, जमीनी हकीकत से रूबरू कराने वाले और चुनावी चुनौतियों के प्रति आगाह करने वाले कार्यकर्ताओं की बातों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा है। इसका असर उन जरूरतमंदों और संघर्षशील लोगों पर भी पड़ रहा है, जो अपनी समस्याएं लेकर जनप्रतिनिधियों तक पहुंचना चाहते हैं।
यह स्थिति केवल वर्तमान विधायकों तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे संभावित प्रत्याशियों के आसपास भी ऐसे समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। कुछ नेता समर्थकों की प्रशंसा को ही जनसमर्थन का पैमाना मानने लगे हैं, जबकि चुनावी मैदान की वास्तविक परिस्थितियों को समझना और मतदाताओं से सीधा संवाद बनाए रखना किसी भी प्रत्याशी के लिए जरूरी है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, चुनाव के समय कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी और जमीनी समस्याओं से दूरी नेताओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। चाटुकारों की बातों में उलझकर यदि जनप्रतिनिधि जनता और अपने पुराने साथियों से संवाद खो देते हैं, तो इसका खामियाजा चुनाव के दौरान भुगतना पड़ सकता है। जनता की नाराजगी का असर केवल संबंधित नेता ही नहीं, बल्कि सरकार और पार्टी की छवि पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल जिले के राजनीतिक माहौल में एक सवाल चर्चा का विषय बना है कि नेताओं के आसपास जुटने वाली भीड़ में वास्तविक जनसमर्थन कितना है और अवसर देखकर नजदीकी बढ़ाने वालों की संख्या कितनी। आने वाला विधानसभा चुनाव ही तय करेगा कि नेताओं का भरोसा जीतने वाले चेहरे जनता का विश्वास हासिल करने में कितने सफल होते हैं।



