स्वतंत्रनिर्भीक पत्रकारिता
BREAKING NEWS
पंकज चौधरी और धर्मपाल सिंह ने प्रदेशवासियों को दी दीपावली की शुभकामनाएंचुनाव करीब आते ही अखिलेश को याद आए रामलला के दर्शन : पंकज चौधरीदसवें दीपोत्सव-2026: अयोध्या में राम दरबार का राज्याभिषेक, योगी ने खींचा प्रभु श्रीराम का रथसूर्यकुमार यादव ने परिवार के साथ पीएम मोदी से की मुलाकात, नन्हीं सरयू ने सुनाया कन्नड़ गीतसुहास एलवाई समेत पैरा खिलाड़ियों ने की पीएम से मुलाकातएलपीजी बॉटलिंग प्लांट में चल रही ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल समाप्तअज्ञात वाहन की ठोकर से ऑटो चालक की मौतडीसीएम में पीछे से घुसी कार एक की मौत चार घायलधनतेरस पर जाम से जूझा हाईवे, सड़क पर उतरे एसीपी ने संभाली कमानपिकप फ्लाईओवर के पास भीषण हादसा, 15 वर्षीय किशोर समेत दो युवकों की मौतपंकज चौधरी और धर्मपाल सिंह ने प्रदेशवासियों को दी दीपावली की शुभकामनाएंचुनाव करीब आते ही अखिलेश को याद आए रामलला के दर्शन : पंकज चौधरीदसवें दीपोत्सव-2026: अयोध्या में राम दरबार का राज्याभिषेक, योगी ने खींचा प्रभु श्रीराम का रथसूर्यकुमार यादव ने परिवार के साथ पीएम मोदी से की मुलाकात, नन्हीं सरयू ने सुनाया कन्नड़ गीतसुहास एलवाई समेत पैरा खिलाड़ियों ने की पीएम से मुलाकातएलपीजी बॉटलिंग प्लांट में चल रही ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल समाप्तअज्ञात वाहन की ठोकर से ऑटो चालक की मौतडीसीएम में पीछे से घुसी कार एक की मौत चार घायलधनतेरस पर जाम से जूझा हाईवे, सड़क पर उतरे एसीपी ने संभाली कमानपिकप फ्लाईओवर के पास भीषण हादसा, 15 वर्षीय किशोर समेत दो युवकों की मौत

बदलते युवा दौर में ABVP की मजबूत पकड़, देशभर के कैंपस में चुनावी सफलता की नई कहानी

बदलते युवा दौर में ABVP की मजबूत पकड़, देशभर के कैंपस में चुनावी सफलता की नई कहानी

नई दिल्ली। देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या नई पीढ़ी अब भी छात्र संगठनों से उसी तरह जुड़ती है, जैसे पहले जुड़ा करती थी। सोशल मीडिया के दौर में युवाओं के पास अपनी बात रखने के कई नए माध्यम हैं। इसके बावजूद छात्रसंघ चुनावों के नतीजे बताते हैं कि कॉलेज परिसरों में संगठन की भूमिका खत्म नहीं हुई है। हाल के चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का प्रदर्शन इसी बात को सामने लाता है। ओडिशा से लेकर दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड तक कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में मिली सफलता ने संगठन को छात्र राजनीति में एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

इस बदलती तस्वीर में ओडिशा के चुनाव खास महत्व रखते हैं। राज्य में करीब आठ साल के अंतराल के बाद छात्रसंघ चुनाव हुए और घोषित नतीजों में ABVP ने विश्वविद्यालयों के स्तर पर बढ़त हासिल की। 13 विश्वविद्यालयों में से आठ में संगठन को सफलता मिली, जबकि बीजू जनता दल के छात्र संगठन बीजू छात्र जनता दल (BCJD) ने पांच विश्वविद्यालयों में जीत दर्ज की। कॉलेजों के घोषित परिणामों में भी ABVP सबसे आगे रही। 342 कॉलेजों में उसके खाते में 208 जीत आईं, जबकि BCJD को 117 और कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को 17 कॉलेजों में सफलता मिली।

ये आंकड़े ओडिशा में छात्र संगठनों के बीच मुकाबले की स्थिति को समझने का आधार देते हैं। लंबे समय बाद चुनाव होने के कारण यहां संगठनात्मक नेटवर्क, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और छात्रों के साथ संपर्क की भी परीक्षा हुई। ABVP की बढ़त महत्वपूर्ण है, लेकिन BCJD की सफलता यह भी बताती है कि राज्य में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा।

  • दिल्ली से पंजाब तक, जीत के अलग-अलग मायने

ओडिशा के नतीजों को देश के दूसरे विश्वविद्यालयों के चुनावों के साथ देखने पर ABVP की संगठनात्मक मौजूदगी का दायरा समझ में आता है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में संगठन ने चार प्रमुख पदों में से तीन पर जीत दर्ज की। पंजाब विश्वविद्यालय में लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद हासिल करना भी उसके लिए महत्वपूर्ण रहा। वहीं, उत्तराखंड के कई कॉलेजों में प्रमुख पदों पर मिली सफलता ने राज्य में उसकी सक्रियता को दिखाया।

इन चुनावों की खास बात यह है कि मुकाबला केवल बड़े विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। अलग-अलग शहरों और कॉलेजों में छात्र संगठनों को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए स्थानीय स्तर पर काम करना पड़ता है। छात्रों की समस्याओं को उठाना, कॉलेज प्रशासन से संवाद करना और चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना किसी भी संगठन के लिए जरूरी होता है। ABVP की लगातार मिल रही सफलताओं में इन पहलुओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, हर विश्वविद्यालय में नतीजे एक जैसे नहीं रहे हैं। कई जगह निर्दलीय उम्मीदवारों और दूसरे छात्र संगठनों ने भी जीत हासिल की है। इससे साफ होता है कि छात्र राजनीति में किसी संगठन की व्यापक मौजूदगी के बावजूद स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की लोकप्रियता महत्वपूर्ण बने रहते हैं।

  • निर्दलीय विजेताओं का झुकाव भी चर्चा में

छात्रसंघ चुनावों के बाद निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कई परिसरों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है और इनमें से बड़ी संख्या में विजेताओं के ABVP से जुड़ने या उसे समर्थन देने की बात सामने आई है। इससे संगठन को उन कॉलेजों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल सकता है, जहां चुनावी मुकाबला करीबी रहा हो।

निर्दलीय उम्मीदवारों को अक्सर स्थानीय स्तर पर अपने व्यक्तिगत संपर्क और छात्रों के बीच पहचान का फायदा मिलता है। ऐसे विजेताओं का किसी बड़े संगठन के साथ जुड़ना उसकी पहुंच बढ़ा सकता है। लेकिन किसी उम्मीदवार का समर्थन करना और औपचारिक रूप से संगठन में शामिल होना दो अलग बातें हैं। इसलिए इस बदलाव का सही आकलन तभी संभव है, जब जुड़ने वाले उम्मीदवारों की स्थिति स्पष्ट हो। इसके बावजूद, चुनाव के बाद बनने वाले ऐसे समीकरण छात्र राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चुनावी जीत के साथ यदि संगठन को नए कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व भी मिलता है, तो उसका प्रभाव अगले चुनावों तक बना रह सकता है।

  • जेन-Z के दौर में संगठन की ताकत क्यों मायने रखती है?

आज की युवा पीढ़ी को पुराने राजनीतिक तरीकों पर सवाल उठाने वाली पीढ़ी के रूप में देखा जाता है। जेन-Z के लिए शिक्षा, रोजगार, अवसर, पारदर्शिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दे अहम हैं। सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को अपनी बात रखने का मंच दिया है, लेकिन छात्रसंघ चुनावों में केवल ऑनलाइन लोकप्रियता जीत की गारंटी नहीं बनती।

कॉलेज परिसर में लगातार सक्रिय रहना, छात्रों की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए प्रशासन तक पहुंचना आज भी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि डिजिटल दौर में भी जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों की भूमिका बनी हुई है। चुनाव के समय प्रचार करना आसान हो सकता है, लेकिन पूरे साल छात्रों के संपर्क में रहना और उनकी समस्याओं को उठाना संगठन की वास्तविक क्षमता को दर्शाता है।

ABVP की सफलता को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। अलग-अलग राज्यों में संगठन की मौजूदगी और चुनावों में उसका प्रदर्शन बताते हैं कि छात्र राजनीति में संगठनात्मक ढांचा अब भी मायने रखता है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जेन-Z का पूरा वर्ग किसी एक संगठन के साथ खड़ा है। युवा मतदाताओं की पसंद अलग-अलग मुद्दों और स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है।

ओडिशा से लेकर दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड तक के चुनावों ने ABVP की संगठनात्मक ताकत को चर्चा में ला दिया है। जेन-Z के दौर में भी कॉलेज परिसरों में सीधा संपर्क, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों पर काम करने की अहमियत बनी हुई है। निर्दलीय विजेताओं का संगठन से जुड़ना यदि औपचारिक रूप लेता है, तो इससे उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।
शिवकुमार राजपूत वरिष्ठ पत्रकार

साझा करें:fxw
हर खबर, हर पल — जुड़े रहें!हर बड़ी खबर सबसे पहले पाने के लिए हमारे न्यूज़लेटर से जुड़ें