विश्वविद्यालय, कुशल नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण में भूमिका
विश्वविद्यालय के संदर्भ में कई मनीषियों के विचार अलग अलग है , लेकिन भारत के राष्ट्र निर्माता की सोंच एक जैसी ह। टैगोर ने विश्विद्यालय को एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में देखा जिससे औपनिवेशिक मानसिकता की जकरण को तोडा जा सके।…
प्रो. सतीश कुमार आचार्य, राजनीति संकाय, इग्नू, नई दिल्ली
विश्वविद्यालय के संदर्भ में कई मनीषियों के विचार अलग अलग है , लेकिन भारत के राष्ट्र निर्माता की सोंच एक जैसी ह। टैगोर ने विश्विद्यालय को एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में देखा जिससे औपनिवेशिक मानसिकता की जकरण को तोडा जा सके। इसी सोंच के साथ उन्होंने विश्वभारती की नीव रखी, वे विश्वविद्यालय को केवल पश्चिमी ज्ञान के उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे स्थान के रूप में देखते थे जहाँ पूर्व अपनी बौद्धिक संपदा को समान स्तर पर विश्व के सामने प्रस्तुत कर सके। उन्होंने कहा था कि विश्वविद्यालय ऐसा स्थान होना चाहिए ‘‘जहाँ पूरा विश्व एक ही घोंसले में अपना घर बनाए।’’ टैगोर का मानना था कि सच्ची शिक्षा प्रकृति के साथ सामंजस्य में होती है, जिसमेंपारंपरिक शैक्षणिक विषयों के साथ कला, संगीत और शिल्प का भी समावेश हो। विश्वविद्यालय की भूमिका केवल रटने पर आधारित शिक्षा देने की नहीं, बल्कि सहानुभूति, रचनात्मकता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का विकास करने की होनी चाहिए।विवेकानंद ने भी सामाजिक परिवेश को ज्ञान के द्वारा बदलने की बात कही। ब्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया विश्वविद्यालय में होनी चाहिए।स्वामी विवेकानंद ने उच्च शिक्षा की अवधारणा को वेदांत के दृष्टिकोण से देखा और व्यक्ति के आंतरिक रूपांतरण पर विशेष बल दिया। उनका तर्क था कि शिक्षा केवल वह मात्रा नहीं है जो आपके मस्तिष्क में भर दी जाए और वहाँ अव्यवस्थित रूप से घूमती रहे। इसके बजाय, विश्वविद्यालय का वास्तविक उद्देश्य ‘‘मनुष्य निर्माण’’ और चरित्र निर्माण को सुगम बनाना है।
गांधी की तत्कालीन विश्वविद्यालय प्रणाली की आलोचना अत्यंत गहरी थी। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत उच्च शिक्षा ने अभिजात वर्ग को भारतीय जनसाधारण की वास्तविकताओं से अलग कर दिया था। अपनी ‘नई तालीम’ की दार्शनिक अवधारणा के माध्यम से, जो आगे चलकर उच्च शिक्षा के प्रति उनके दृष्टिकोण में भी दिखाई देती है, गांधी का मानना था कि विश्वविद्यालय ऐसे बौद्धिक वर्ग का निर्माण नहीं करें जो श्रम और हाथ से किए जाने वाले काम से पूरी तरह अलग हो। भारत के सबसे अधिक शिक्षित महान संस्थापकों में से एक के रूप में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने विश्वविद्यालय को संरचनात्मक सामाजिक परिवर्तन और जाति-व्यवस्था के उन्मूलन का एक महत्वपूर्ण साधन माना। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक चिंतन तथा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के विकास पर बल दिया। उनका प्रसिद्ध नारा-‘‘शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो’’-उच्च शिक्षा को राजनीतिक और सामाजिक मुक्ति के केंद्र में स्थापित करता है। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शनों और धरनों के कई उदाहरण मिलते हैं। ऐसे भी कुछ उदाहरण हैं जब भारत के प्रधानमंत्री को विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।
वर्ष 1977 में, जब आपातकाल समाप्त हुआ, उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी जेएनयू की कुलाधिपति थीं, लेकिन उन्हें परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विश्वविद्यालयों को देश के ‘‘मंदिर’’ कहा था। इन मंदिरों का अर्थ केवल शिक्षा प्राप्त करने के स्थान से नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए त्याग और समर्पण की गहरी भावना से भी था। भारत में आलोचनात्मक चिंतन को अक्सर राष्ट्रीय हितों से दूर जाने और राष्ट्र के बारे में बात करने तथा राष्ट्र का सम्मान करने वालों पर तीखा प्रहार करने के रूप में समझा जाता है। आइए अमेरिकी विश्वविद्यालयों और थिंक टैंकों का उदाहरण लेते हैं। वे अपने देश के हितों की सेवा कैसे करते हैं?
यह अवलोकन सही है कि अमेरिकी विश्वविद्यालय अपने देश के राष्ट्रीय हितों की निकटता से सेवा करते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित संस्थानों, संघीय सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंध गहरे, संस्थागत और वित्तीय रूप से व्यवस्थित हैं। यद्यपि अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसर छात्र विरोध प्रदर्शनों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जीवंत संस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनकी संरचनात्मक, आर्थिक और वैज्ञानिक व्यवस्थाएँ सीधे तौर पर देश की भू-राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक शक्ति को मजबूत करने में योगदान देती हैं। जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई उभरते देशों ने भी इसी प्रकार की व्यवस्था विकसित की है। राष्ट्रीय भावना उनके शिक्षा तंत्र में अंतर्निहित है।प्रो. योगेश सिंह मानना है कि करदाताओं के धन से संचालित विश्वविद्यालयों को सीमित राजनीतिक विचारधाराओं के मंच बनने के बजाय राष्ट्रीय विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।इस दृष्टिकोण से, ‘‘आलोचनात्मक चिंतन’’ को अक्सर यूरो-केंद्रित या वामपंथी अकादमिक समूहों द्वारा एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जब भी प्राचीन भारतीय ग्रंथों पर आधारित उपलब्धियों-जैसे आर्यभट्ट का खगोल विज्ञान, सुश्रुत की शल्य चिकित्सा तकनीक या कौटिल्य का अर्थशास्त्र-को प्रस्तुत किया जाता है, तो उन्हें कठोर संदेह की कसौटी पर परखा जाता है, जबकि आधुनिक पश्चिमी ढाँचों को शायद ही कभी उसी स्तर की कठोर जाँच से गुजरना पड़ता है।
विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा के केंद्र नहीं होते; वे किसी राष्ट्र के बौद्धिक चरित्र का निर्माण करने वाले संस्थान होते हैं और आने वाली पीढ़ियों को उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। कुछ ही संस्थान इस जिम्मेदारी को दिल्ली विश्वविद्यालय से अधिक गहराई से प्रतिबिंबित करते हैं। एक सदी से अधिक समय से दिल्ली विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख उच्च शिक्षा केंद्रों में से एक रहा है। 2021 में पदभार संभालने के बाद से प्रोफेसर योगेश सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप महत्वपूर्ण सुधारों के दौर से आगे बढ़ाया है। उनके नेतृत्व का ध्यान बहुविषयक शिक्षा, शैक्षणिक नवाचार, डिजिटल शासन, संस्थागत सुधार, अनुसंधान और भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने पर केंद्रित रहा है। परंपरा और आधुनिकता को परस्पर विरोधी विचार मानने के बजाय, उनका दृष्टिकोण भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत को समकालीन ज्ञान प्रणालियों, तकनीकी नवाचार और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता के साथ जोड़ने का प्रयास करता है। इसी प्रक्रिया में दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्वयं को ‘विकसित भारत 2047’ की व्यापक राष्ट्रीय आकांक्षा में योगदान देने वाली संस्था के रूप में स्थापित किया है, जहाँ उच्च शिक्षा ज्ञान सृजन, समावेशी विकास, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्र निर्माण के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है।प्रोफेसर योगेश सिंह का विजÞन यह भी मानता है कि वैश्विक सम्मान प्राप्त करने वाला विश्वविद्यालय शोध-आधारित होना चाहिए। इसी दिशा में दिल्ली विश्वविद्यालय ने सतत विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक नीति, स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक समावेशन और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में अंतर्विषयक सहयोग और नवाचार को प्रोत्साहित किया है।
सांस्कृतिक सहभागिता के प्रति यह प्रतिबद्धता वर्ष 2026 में प्रथम दिल्ली विश्वविद्यालय साहित्य महोत्सव के शुभारंभ के साथ विशेष रूप से दिखाई दी। साहित्य, समाज और सार्वजनिक जीवन के बीच संवाद के मंच के रूप में परिकल्पित इस प्रथम महोत्सव का विषय था-‘‘राष्ट्र प्रथम: विविधता में एकता। चर्चाओं में ‘राष्ट्र प्रथम’ से लेकर वैदिक ज्ञान की वैश्विक प्रासंगिकता और बदलती दुनिया में भारत की उभरती भूमिका तक अनेक विषय शामिल थे। लेखकों, कवियों, फिल्मकारों, सार्वजनिक बुद्धिजीवियों और विद्वानों ने उन संवादों में भाग लिया, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, आलोचनात्मक चिंतन और सांस्कृतिक चेतना के विकास में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। कई मायनों में, यह महोत्सव प्रोफेसर योगेश सिंह के विश्वविद्यालय संबंधी व्यापक विजन को प्रतिबिंबित करता है-एक ऐसा स्थान जहाँ बौद्धिक खोज और भारत की सभ्यतागत परंपराएँ एक-दूसरे को मजबूत करती हैं। हालाँकि प्रोफेसर योगेश सिंह अत्यंत मुखर और गतिशील हैं, फिर भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर उन्हें पुनर्विचार करके नई व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्यार्थी और शिक्षक के रूप में मेरा मानना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को युवा विद्वानों का एक ऐसा समूह तैयार करना चाहिए जो चीनी भाषा में दक्ष होने के साथ-साथ चीन की रणनीति और भारत के पड़ोसी देशों की गहरी समझ रखता हो। दूसरे, नवनियुक्त शिक्षकों को अकादमिक कठोरता और अनुशासन के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
शिक्षकों के अधिकारों की तुलना में उनके कर्तव्यों पर कम ध्यान दिए जाने से विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हो रही है। इसके बावजूद, विश्वविद्यालय का स्रातक कार्यक्रम आज भी भारत में सर्वश्रेष्ठ है।दिल्ली राजनीति का केंद है। स्वाभाविक रूप से छात्र राजनीति का भी मदर बोर्ड दिल्ली विश्वविद्यालयहै। हर विचार के राजनीतिक संगठन मुस्तैदी के साथ सक्रिय है। उनकी हर नजर कुलपति की कमियों और ब्यस्था पर टिकी होती है। एक भी गलत निर्णय बवाल और उबाल पैदा करता है जिसकी सीधी गूंज संसद और विदेशो में सुनाई देती है । ऐसे तंग हालात कुलपति का पद तलवार की धार पर चलने से कम नहीं है। उसके बावजूद प्रोफ सिंह ने टैगोर, गाँधी और आंबेडकर की सोच और चिंतन को धरती पर उतारने की सफल कोशिश की है। एक बेहतर ब्यक्ति से ही बेहतर समाज की नीव रखी जाती है। प्रधानमंत्री मोदी के चिंतन का भारत अपनी पहचान के लिए विदेशी युक्तियों और टिप्पणियों पर निर्भर नहीं करता। हमारी ज्ञान परम्परा की विशाल हिमालय हमारे सामने खड़ा है, केवल उसे सही से पहचनाने की जरुरत है, जिसकी कोशिश दिल्ली विश्वविद्लाय के कुलगुरु ने शुरू की है। यह राष्ट्र का मानक बन सकता है।