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स्वाध्याय एवं संस्कृति का परिचायक पर्व है रक्षाबंधन

स्वाध्याय एवं संस्कृति का परिचायक पर्व है रक्षाबंधन

पायनियर समाचार सेवा। सितारगंज। श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है इसे कूर्मांचल क्षेत्र में जन्यो पुन्युं भी कहते हैं। लोग उपाकर्म करके नूतन जनेऊ धारण करते हैं फिर रक्षाबंधन करते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार वेदों को धर्म का मूल माना गया है ।वेद के मुख्य तीन विभाग हैं -ज्ञान, कर्म एवं उपासना। ज्ञान कांड ही ऋग्वेद, कर्मकांड यजुर्वेद और उपासना कांड सामवेद है। तीनों वेदों को मानने वाले लोग अलग-अलग समय में उपाकर्म करते हुए व वेदों का अध्ययन आरंभ करते हैं। वस्तुत: वेद के अध्ययन का शुभारंभ करना ही उपाकर्म कहलाता है। ऋग्वेदी लोग श्रावण मास के श्रवण नक्षत्र में, यजुवेर्दी लोग श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भद्रा रहित समय में और सामवेदी लोग भाद्रपद शुक्ल पक्ष हस्त नक्षत्र में उपाकर्म करते हुए नवीन जनेऊ धारण व रक्षाबंधन करके वेद का अध्ययन आरंभ करते हैं ।
वर्तमान समय में अधिकतर भारतीय जन यजुवेर्दी परंपरा से ही कर्मकांड आदि संपादित करते हैं इसलिए श्रावण पूर्णिमा को ही रक्षाबंधन समग्र देश में धूमधाम से मनाया जाता है। किसी नदी, तालाब या जलधारा के समीप जाकर अरुंधती सहित सप्तर्षियों का विधिवत पूजन करते हुए वंशोक्त एवं वेदोक्त ऋषियों का तर्पण किया जाता है। वर्तमान में उपाकर्म बहुत कम ही लोग कर पाते हैं। सामान्य रुप से छंद लेकर जनेऊ धारण कर लिया जाता है और रक्षा बांधी जाती है। रक्षाबंधन का स्थान भी अब राखी के रूप में देखने को मिलता है । वेदारंभ के स्थान पर अब भाई और बहन के प्रेम के रूप में राखी का त्यौहार अधिक दिखाई देता है। यह भी हमारी संस्कृति में बहुत बड़ा बाहरी परिवर्तन है।
रक्षाबंधन करने में राजा बलि की कथा को भी आधार मान लेते हैं । मुख्य रूप से बलि की वचनबद्धता को ध्यान में रखकर यह मंत्र बोला जाता है–
येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वांमनुबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल।

वस्तुत: रक्षाबंधन का पर्व स्वाध्याय का प्रतीक पर्व है। हम अपने सत साहित्य का अध्ययन करें वेद ,पुराण, उपनिषद आदि का अध्ययन करते हुए समाज को भी अध्ययन के लिए प्रेरित करें। प्राचीन काल में ऋषि महर्षि वर्षा काल में एक स्थान पर एकत्र होकर सभी को ज्ञान उपदेश देते थे यही उपाकर्म कहलाता था। स्वाध्याय का अर्थ ग्रन्थों का अध्ययन सहित स्वयं को पहचानना भी है। स्वाध्याये नित्ययुक्त: स्यात।
-डॉ गोपाल कृष्ण जोशी, प्रवक्ता हिन्दी

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