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ठाकुर-ब्राह्मणों की हालत SC-ST से भी खराब? राकेश टिकैत के बयान ने आरक्षण पर छेड़ी नई बहस

देश में आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज होती नजर आ रही है। इस बार चर्चा के केंद्र में किसान नेता राकेश टिकैत का बयान है। टिकैत ने जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण की पैरवी करते हुए…

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ठाकुर-ब्राह्मणों की हालत SC-ST से भी खराब? राकेश टिकैत के बयान ने आरक्षण पर छेड़ी नई बहस

देश में आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज होती नजर आ रही है। इस बार चर्चा के केंद्र में किसान नेता राकेश टिकैत का बयान है। टिकैत ने जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण की पैरवी करते हुए कहा कि गरीब व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उसे आगे बढ़ने के लिए समान अवसर और सरकारी मदद मिलनी चाहिए। उनके इस रुख ने आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

राकेश टिकैत का तर्क है कि समाज में गरीबी केवल किसी एक जाति तक सीमित नहीं है। ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सामान्य वर्गों में भी ऐसे परिवार हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। ऐसे परिवारों के बच्चों को शिक्षा, रोजगार और दूसरी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी सहायता का आधार केवल जाति होना चाहिए या फिर व्यक्ति की वास्तविक आर्थिक स्थिति भी इसमें अहम भूमिका निभानी चाहिए?

बिहार के आंकड़ों ने भी उठाए सवाल

बिहार में हुई जाति आधारित गणना के आर्थिक आंकड़ों ने भी सामान्य वर्ग के भीतर आर्थिक असमानता की तस्वीर सामने रखी थी। अलग-अलग सामान्य जातियों के परिवारों की आर्थिक स्थिति को लेकर आंकड़े सामने आए थे। इनमें राजपूत समाज के करीब 24.89 फीसदी परिवारों के गरीब होने का आंकड़ा भी चर्चा में रहा।

हालांकि इन आंकड़ों को पूरे देश के सामान्य वर्ग की आर्थिक स्थिति का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि सामान्य वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की समस्याओं को किस तरह संबोधित किया जाए।

क्या गरीब की पहचान सिर्फ उसकी जाति से होगी?

बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी गरीब ब्राह्मण या ठाकुर परिवार के पास बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, तो क्या केवल सामान्य वर्ग में होने की वजह से उसकी आर्थिक परेशानी कम हो जाती है?यही तर्क आर्थिक आधार पर आरक्षण या सहायता की मांग करने वाले लोगों की ओर से दिया जाता है। उनका कहना है कि गरीबी को भी सरकारी नीतियों में पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि SC/ST आरक्षण का आधार केवल आर्थिक गरीबी नहीं है। यह व्यवस्था ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव, प्रतिनिधित्व और लंबे समय से चली आ रही सामाजिक वंचना से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था है। दूसरी ओर, सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए EWS आरक्षण की व्यवस्था पहले से मौजूद है।

सवर्ण नेताओं से भी उठ रहे सवाल

राकेश टिकैत के बयान के बाद अब राजनीतिक बहस का एक दूसरा पहलू भी सामने आ गया है। सवाल यह है कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की आवाज राजनीतिक मंचों पर कितनी मजबूती से उठती है?ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद और जीतन राम मांझी जैसे नेता अलग-अलग मौकों पर आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर अपनी राय रखते रहे हैं। वहीं अब टिकैत के बयान ने आर्थिक आधार को लेकर चर्चा को फिर से सामने ला दिया है।इस बहस में राजनाथ सिंह और बृजेश पाठक जैसे बड़े सवर्ण चेहरों से भी सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या सामान्य वर्ग के गरीब परिवारों के लिए आर्थिक और शैक्षणिक अवसर बढ़ाने को लेकर राजनीतिक स्तर पर और ज्यादा मुखरता दिखाई जानी चाहिए?फिलहाल राकेश टिकैत के बयान ने आरक्षण की बहस को एक नए कोण से सामने रखा है। मुद्दा सिर्फ ठाकुर या ब्राह्मण समाज का नहीं, बल्कि उन सभी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का है जो बेहतर शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसर चाहते हैं। अब असली सवाल यही है—क्या आरक्षण और सरकारी सहायता में जाति के साथ आर्थिक स्थिति को भी उतनी ही गंभीरता से देखा जाना चाहिए?

 

लेखक

Rashmi Singh

रश्मि सिंह मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और मीडिया एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ग्राउंड रिपोर्टिंग और कंटेंट लेखन से की तथा समय के साथ देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों और समाचार चैनलों में कार्य किया। राजनीति, समसामयिक घटनाक्रम, उत्तर प्रदेश की खबरों, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन जगत की रिपोर्टिंग एवं विश्लेषण में उन्हें विशेष अनुभव प्राप्त है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने तथ्यपरक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता को अपनी पहचान बनाया है।

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