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राजस्थान-हरियाणा से 18 बाल-बंधुआ मजदूर मुक्त, असंगठित मजदूर मोर्चा की पहल रंग लाई – ईंट भट्ठों पर चल रही थी क्रूरता, अनुसूचित जाति के परिवार थे बंधक

राजस्थान-हरियाणा से 18 बाल-बंधुआ मजदूर मुक्त, असंगठित मजदूर मोर्चा की पहल रंग लाई – ईंट भट्ठों पर चल रही थी क्रूरता, अनुसूचित जाति के परिवार थे बंधक

बांदा असंगठित मजदूर मोर्चा और लेबर डेवलेपमेंट फाउंडेशन के प्रयासों से बांदा जनपद के 18 बाल एवं बंधुआ मजदूरों को राजस्थान और हरियाणा के ईंट भट्ठों से मुक्त कराया गया है। सभी मजदूर अनुसूचित जाति समुदाय से हैं और महीनों से बंधक बनाकर रखे गए थे। मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दल सिंगार के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन ने कार्रवाई कर इन्हें छुड़ाया।

दो राज्यों के ईंट भट्ठों से कराए गए आजाद
मुक्त कराए गए मजदूरों में 6 मजदूर राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की रावला मंडी स्थित गणेश ब्रिक्स कंपनी से और 12 मजदूर हरियाणा के रेवाड़ी जिले के जाडरा गांव स्थित भगत जी ईंट भट्ठा से आजाद हुए। दोनों जगह मजदूरों से जबरन काम कराया जा रहा था।

राजस्थान में फंसे मजदूर नीरज ने बताया कि नवंबर 2025 में ठेकेदार पहलवान उर्फ प्रदीप कर्ज/एडवांस का लालच देकर ट्रक से श्रीगंगानगर ले गया था। वहां बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। विरोध पर मालिक सुखबीर और ठेकेदार ने लाखों का कर्ज बताकर धमकाया। घर जाने पर मारपीट, गाली-गलौज और बच्चों समेत भट्ठे में झोंककर जलाने की धमकी दी जाती थी।

हरियाणा में फंसे रमेश व अन्य 3 परिवारों के 12 लोगों को भी जमादार दिलीप नवंबर 2025 में एडवांस देकर ले गया था। कर्ज चुकाने के बाद भी मजदूरी नहीं दी गई और बिना पैसे के काम कराया जा रहा था।4-5 जून 2026 को मामले की जानकारी मिलने पर मोर्चा ने परिवारों से संपर्क किया। 8 जून को दल सिंगार ने राजस्थान, हरियाणा और यूपी के मुख्य सचिव, श्रम आयुक्त, तीनों जिलों के डीएम-एसपी और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1976, इंटरस्टेट माइग्रेंट वर्कमैन एक्ट 1979, एससी-एसटी एक्ट और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए पत्र भेजा।10-11 जून को स्मरण पत्र भेजने और अधिकारियों से बात के बाद 12 जून को टीम गठित कर सभी 18 मजदूरों को मुक्त कराया गया। 14 जून को सभी मजदूर बबेरू, बांदा पहुंच गए।

राष्ट्रीय अध्यक्ष दल सिंगार ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बंधुआ मजदूरी कानून का ठीक से पालन नहीं किया।मजदूरों को बिना सुरक्षा और बिना मुक्ति प्रमाण पत्र के ही घर भेज दिया गया। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के मजदूरों की स्थिति दयनीय है, पर प्रशासन स्थानीय रोजगार के लिए कुछ नहीं कर रहा।”बड़े उद्योगपतियों और किसानों का कर्ज माफ हो सकता है, तो मजदूरों का क्यों नहीं? सरकार चुनने में सबसे ज्यादा भागीदारी असंगठित मजदूरों की है, फिर भी उनके कानून की धज्जियां उड़ती हैं।
लेबर डेवलेपमेंट फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भगवानदास सिंह यादव ने कहा कि मुक्त मजदूरों का पुनर्वास न होने से पलायन मजबूरी है। प्रशासन समय पर पुनर्वास और बच्चों को शिक्षा से जोड़े तो बाल-बंधुआ मजदूरी रुकेगी।

1. ग्राम पून, बबेरू: अशोक कुमार 40 वर्ष, आशा देवी 38 वर्ष, खुशबू 16 वर्ष, खुशिया 14 वर्ष, शारदा प्रसाद 5 वर्ष
2. ग्राम चूहका पुरवा, ओरन अतर्रा: बबलू कुमार 35 वर्ष, कल्ली देवी 30 वर्ष, अजय 9 वर्ष, बीरू 7 वर्ष, सत्यम 3 माह, रमेश 24 वर्ष, शिवराम 40 वर्ष
3. गांव बिसंडी, बिसंडा: नीरज 31 वर्ष, प्रियंका 30 वर्ष, मनोज 10 वर्ष, महिमा 8 वर्ष, प्रांशी 4 वर्ष, दीपक 2 वर्ष
सभी अनुसूचित जाति से हैं। फिलहाल मुक्त मजदूर अपने घर पहुंच चुके हैं, लेकिन पुनर्वास और मुक्ति प्रमाण पत्र का इंतजार है।

अक्षांश निगम बांदा

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