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स्वाध्याय सहित संस्कृति बोध का पर्व है हरतालिका

स्वाध्याय सहित संस्कृति बोध का पर्व है हरतालिका

पायनियर समाचार सेवा। सितारगंज। भारतीय संस्कृति वेदों के आधार पर ही संचालित संस्कृति है। वेदों में सामवेद का विशेष महत्व है। अलग-अलग वेदों को मानने वाले लोग अलग-अलग तिथियों पर वेदारंभ या उपाकर्म करते हैं। ऋग्वेदी लोग श्रवण नक्षत्र में, यजुवेर्दी लोग श्रावण पूर्णिमा में और सामवेदी भाद्रपद शुक्ल तृतीया में उपाकर्म कर हरतालिका मानते हैं। रविवार को सामवेदी हरतालिका पर्व मनायेंगे।
यद्यपि हरितालिका और उपाकर्म दोनों अलग-अलग उपक्रम हैं लेकिन कुमाऊं में इसे हरताली नाम से भी ख्याति प्राप्त है। सामवेदी लोग इस दिन से वेद का अध्ययन आरंभ करते हैं। राजा हिमांचल पार्वती का विवाह नारद की प्रेरणा से विष्णु के साथ करने को तैयार हो गए तब पार्वती बड़ी दुखी हो गई क्योंकि वह शंकर के साथ विवाह करना चाहती थी। उसकी सखियां उसे गुफा में छुपा देती हैं और पार्वती शिव भक्ति में लग जाती है। शिव प्रसन्न होकर उससे विवाह का वचन देते हैं। शिव को प्रसन्न करने के लिए पार्वती ने यह व्रत तृतीया को ही आरंभ किया था इसलिए यह तिथि हरतालिका भी कही जाती है।
शिव स्वयं वेद स्वरूपही हैं। उनकी शक्ति पार्वती है, अर्थात शक्ति तत्व का ज्ञान होने पर ही शिव अर्थात वेद का ज्ञान हो सकता है यह भी इस पर्व का विशिष्ट अर्थ है।
अलिभि:हरिता यस्मात् तस्मात् हरितालिका।।
इसलिए इसे हरतालिका नाम से भी जाना जाता है और कुमाऊं में अपभ्रंश होकर हरताली शब्द प्रचलित है।
हरतालिका पर्व निश्चल भक्ति, अचल अनुराग,व प्रेम विजय का पर्व है।
शिवायै हरकान्तायै, प्रकृत्यै सृष्टिहेतवे।
नमस्ते ब्रह्मचारिण्यै,जगद्धात्र्यै नमो नम:।।
-डॉ गोपाल कृष्ण जोशी, प्रवक्ता हिंदी

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